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जीवन प्रबंधन सिखाते हनुमान

जो अपना पक्ष प्रस्तुत करने और कार्य करने के लिए उचित समय और शब्दों का चयन करते हैं, वे ही जीवन-प्रबंधन समुचित ढंग से कर पाते हैं। हनुमानजी यह कला भली-भांति जानते हैं। वे अनेक स्थलों पर अपनी इस अप्रतिम कला का प्रदर्शन करते हैं और दूसरे पक्ष को प्रभावित करने और अपनी बात मनवाने में शत-प्रतिशत सफल रहते हैं। श्रीराम से पहली बार भेंट होने पर वे श्रीराम की कृपा प्राप्त करने में सफल होते हैं। वे अपने स्वामी का गुणगान करते हैं और अपनी दीन-हीनता प्रदर्शित करते हैं। श्रीराम उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं। जब हनुमानजी श्रीराम को प्रसन्न देखते हैं तो तुरंत अपने मन की बात उनके सामने प्रकट कर देते हैं-
देख पवनसुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला
(किष्किन्धाकाण्ड)

(स्वामी को अनुकूल अर्थात् प्रसन्न देखकर पवन कुमार हनुमानजी के हृदय में हर्ष छा गया और उनके सब दुख जाते रहे। उन्होंने कहा-हे नाथ! इस पर्वत पर वानरराज सुग्रीव रहता है। वह आपका दास है।)
 तेहि सन नाथ मयत्री कीजै। दीन जानि तेहि अभय करीजे।
 सो सीता कर खोज कराइहि। जहं तहं मरकट कोटि पठाइहि।।
(किष्किन्धाकाण्ड)

(हे नाथ! उससे मित्रता कीजिए और उसे दीन जानकर निर्भय कर दीजिए। वह सीताजी की खोज कराएगा और जहां-तहां करोड़ों वानरों को भेजेगा।)

वे भली-भांति जानते हैं कि भगवान दीनता और मधुर शब्दों से प्रसन्न होते हैं, अत: वे ऐसा करते हैं, क्योंकि शब्द-शक्ति बहुत प्रभावकारी और अचूक होती है। अत: वे अपने शब्दों से उन्हें प्रसन्न कर लेते हैं। उनके मन में अपने स्वामी सुग्रीव की दीन-हीन दशा का चित्र तुरंत उभरता है और वे उनका उद्धार कराने का यह उचित अवसर मानते हैं। अत: वे अविलम्ब सुग्रीव को उनका दास बताते हुए उससे मित्रता करने का प्रस्ताव रखते हैं। साथ ही कहते हैं कि उससे मित्रता करके आप घाटे में नहीं रहेंगे। मित्रता के बदले में वह आपकी पत्नी सीता की खोज कराएगा। इस प्रकार यहां अपनी वाक्पटुता से एक तीर से कई संधान करते हैं और श्रीराम से सुग्रीव की मित्रता अग्नि की साक्षी देकर करा देते हैं।

इस प्रकार हमें यहां उनकी चतुरता, वाक्पटुता और समय-प्रबंधता के अद्भुत सामंजस्य के दर्शन होते हैं।

वे बात करते समय यथास्थितिवादी हैं, कोई अतिशयोक्ति, लाग-लपेट और बात को घुमा-फिराकर कहना अथवा पहेलियां बुझाना उन्हें पसंद नहीं। वे स्पष्टवादी हैं, इसलिए सबके प्रिय हैं-
 तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।
 पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति बढ़ाइ।।
(किष्किन्धाकाण्ड)
(तब हनुमानजी ने दोनों ओर की सब कथा सुनाकर अग्नि को साक्षी देकर परस्पर दृढ़ करके प्रीति जोड़ दी।)
डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित ‘हनुमान जी का कुशल प्रबंधन’ से

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