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हिमाचल के गांवों को सता रहा है प्लेग का खतरा

हिमाचल प्रदेश के रोहरू ग्रामीण इलाके के निवासी 'भगवान के प्रकोप' के डर में जीवनयापन कर रहे हैं। ग्रामीणों के इस डर की वजह वास्तव में चूहों से फैलने वाला न्यूमोनिक प्लेग है, लेकिन उनमें से ज्यादातर का मानना है कि हर 10 से 15 साल में भगवान के प्रकोप के कारण यह बीमारी फैलती है।

शिमला जिले के रोहरू प्रखंड के निवासियों की गणना के मुताबिक इस साल के किसी भी समय उनके ऊपर भगवान का प्रकोप हो सकता है। रोहरू व उसके आसपास के इलाकों में करीब 20,000 लोग रहते हैं।

चण्डीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडीकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) के डिपार्टमेंट ऑफ कम्युनिटी मेडीसिन द्वारा वर्तमान में किए जा रहे एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडीकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने दो साल के इस अध्ययन की अनुमति दी है। इसमें 2002 में रोहरू में फैले प्लेग से सम्बंधित कारकों का अध्ययन किया जा रहा है। उस साल प्लेग में चार लोगों की जान चली गई थी।

पीजीआईएमईआर के सहायक प्रोफेसर व मुख्य शोधकर्ता सोनू गोयल ने बताया, ''कुछ स्थानीय लोग जानते हैं कि चूहों से यह बीमारी फैलती है। चूहों के शरीर पर रहने वाली मक्खी के काटने से यह रोग फैलता है। इसके बाद भी उनमें से ज्यादातर इसे भगवान का प्रकोप मानते हैं।''

उन्होंने कहा, ''अध्ययन में शामिल ज्यादातर लोगों का कहना है कि प्रत्येक 10 से 15 साल में प्लेग फैलता है और इस साल जब स्थानीय देवताओं के अनुसार भारी हिमपात होगा तब यह बीमारी दोबारा फैल सकती है।''

अध्ययनकर्ताओं के समूह ने 2002 में प्लेग से मारे गए लोगों सहित 150 से ज्यादा स्थानीय लोगों व चिकित्सा अधिकारियों के साक्षात्कार लिए थे।

अध्ययन में देखा गया कि रोहरू के ज्यादातर लोगों की जीविका कृषि आधारित है। वे बहुत अंधविश्वासी हैं और उनका अपने देवी-देवाताओं में अटूट विश्वास है। ज्यादातर लोग नशे के आदी भी हैं। उनमें शराब पीना व धूम्रपान सामान्य हैं। यहां कृषि भूमि जंगलों से जुड़ी हुई है। अध्ययन के मुताबिक यहां खेतों में रहने वाले चूहे घरों के अंदर मिलते हैं और जंगली चूहे अधिक आबादी वाले इलाकों में मिल सकते हैं।

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