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खर्चा अपना, दोस्ती पक्की

दो दिन बाद स्कूल की छुट्टियां होने वाली थीं। डीगू दूसरे दिन स्कूल गया। वहां उसके दोस्त मिले। इन छुट्टियों में उनकी वंडरलैंड घूमने की तैयारी थी। दोस्तों ने पूछा - ‘डीगू भाई, वंडरलैंड घूमने चलना है कि नहीं।’ लेकिन डैड की समझाई हुई बातें डीगू के दिमाग में घूम रही थीं

डीनू खरगोश का बेटा डीगू बहुत खुश था। उसके पेपर खत्म हो गए थे और दोस्तों के साथ घूमने की योजना बना रहा था। मीकू कछुआ और चीकू बंदर उसके दोस्त थे। तीनों इन छुट्टियों में ऐसी जगह जाना चाहते थे, जहां खूब मौज-मस्ती करें। उन्होंने वंडरलैंड घूमने की योजना बना ली थी। लेकिन समस्या यह आ रही थी कि वहां घूमने के लिए पैसे खर्च कौन करेगा, क्योंकि मीकू और चीकू चालाक थे और अपनी पॉकेट मनी से खुद एक पैसा भी खर्च नहीं करते थे। जब भी स्कूल की कैंटीन में कुछ खाना-पीना होता था, उस सबके लिए डीगू को ही खर्चा करना पड़ता था। डीगू सीधा-सादा था, इसलिए उनकी बातों में भी जल्दी आ जाता था। उसके मन में यह बात कभी नहीं आई कि उन्हें भी तो अपनी पॉकेट मनी खर्च करनी चाहिए।

पहले डीगू अपनी मॉम से कभी-कभार ही पैसे मांगता था, लेकिन जब से नये स्कूल में दाखिला हुआ, तब से वह रोजाना पॉकेट मनी ले जाने लगा था। अब वह अपने डैड और मॉम से ज्यादा पैसे देने की मांग करता था। डीनू और मीनू को चिंता होने लगी थी कि आखिर उनका बेटा ज्यादा पैसे देने की मांग क्यों करता है। उन्होंने अब उसकी गतिविधियों पर ध्यान देना शुरू कर दिया था। वह खाने-पीने के मामले में भी लापरवाह होता जा रहा था। मॉम उससे कहती कि बेटे, प्लेट में रखा खाना फिनिश करके जाना, लेकिन वह पूरा खाना कभी खाकर ही नहीं जाता। हां, स्कूल के लिए रखा लंच का डिब्बा जरूर खाली लेकर आता था।

एक दिन डीनू और मीनू ने डीगू से पूछा- ‘बेटे, सही-सही बात बताना। हमने कभी भी तुम्हें पैसे देने से मना नहीं किया। हम तुम्हें रोजाना पॉकेट मनी देते हैं। अब तुम और ज्यादा पैसों की मांग करने लगे हो। कहीं तुम उन पैसे को फिजूल में तो खर्च नहीं करते हो?’ डीगू ने बताया- ‘डैड, क्लास में मेरे दो दोस्त हैं- मीकू और चीकू। हम तीनों इंटरवल में साथ-साथ ही खाना खाते हैं। मेरा खाना उन्हें बहुत अच्छा लगता है तो मैं अपने खाने को उन्हें ही खिला देता हूं। स्कूल की कैंटीन में कुछ खाने-पीने के लिए हम साथ-साथ ही जाते हैं, तो वहां मैं ही पे करता हूं। ऐसा करना मुङो अच्छा लगता है। एक दिन मेरे पास पैसे नहीं थे तो वे नाराज हो गये थे और कैंटीन वाले अंकल को उधार करना पड़ा था। वे दोनों एक पैसा भी खर्च नहीं करते हैं।’ डीनू-मीनू को अब समझ आ गया कि असली वजह क्या है। डीनू ने समझाया- ‘बेटे, ये सब तो ठीक है, लेकिन एक बात बताओ, जब तुम तीनों दोस्त हो, तो तीनों का ही फर्ज बनता है कि एक-एक दिन सभी अपनी पॉकेट मनी में से खर्च करें। तुम अकेले ही क्यों? ऐसा करने से दोस्ती ज्यादा दिन नहीं चलती, उसमें दरार पैदा हो जाती है। दोस्ती तभी ज्यादा पक्की हो सकती है, जब सभी अपना बराबर-बराबर खर्च करें। ऐसा करने से अच्छी आदत बनती है। लालच पैदा नहीं होता। तुम अकेले ही खर्च करते हो, इसलिए उन दोनों में न खर्च करने का लालच आ गया है। इसलिए कल अपने दोस्तों से कहना- हमारी दोस्ती तभी अच्छी रहेगी, जब सभी अपना बराबर-बराबर खर्चा करेंगे।

दो दिन बाद स्कूल की छुट्टियां होने वाली थीं। डीगू दूसरे दिन स्कूल गया। वहां उसके दोस्त मिले। तीनों की इन छुट्टियों में वंडरलैंड घूमने की तैयारी थी। दोस्तों ने पूछा - ‘डीगू भाई, वंडरलैंड घूमने चलना है कि नहीं।’ लेकिन डैड की समझाई हुई बातें डीगू के दिमाग में घूम रही थीं। उसने दोस्तों से कहा- भई, घूमने तो चलेंगे, लेकिन खर्चा अपना-अपना करना पड़ेगा, और तभी घूमने में मजा भी आयेगा। यह बात अब मीकू-चीकू की समझ में भी आ गई थी। उन्होंने विचार किया कि क्यों न हम तीनों बराबर-बराबर पैसे मिला लें और उसे डीगू को ही दे दें, वही घूमने और खाने-पीने में हुए खर्चे पे करता रहेगा। अब तीनों अच्छे दोस्त बन गये थे।

क्या कहती है कहानी दोस्ती तभी आगे तक बनी रह सकती है, जब आप भी उसमें बराबर का साथ दें।

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