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जिलों की समीक्षा ने खोल दी भाजपा की पोल

भारतीय जनता पार्टी विधानसभा चुनाव में  हार के कारणों की विस्तृत समीक्षा चार अप्रैल को करेगी लेकिन इसके पहले ही जिलों की समीक्षा बैठकों में उभर रहे बिन्दुओं ने पार्टी में तूफान खड़ा कर दिया है। कार्यकर्ताओं ने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा में देरी, भितरघात तथा पार्टी नेताओं के बड़बोलेपन को हार के लिए जिम्मेदार ठहराया है, वहीं दिशाविहीन तरीके से चुनाव लड़ने के लिए पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को भी सीधे निशाने पर लिया है।
 जिलों की यह समीक्षा रिपोर्टे 4 अप्रैल को प्रदेश स्तरीय समीक्षा बैठक में रखी जाएगी। बैठक में भाग लेने के लिए पार्टी के सभी प्रदेश पदाधिकारियों, जिलाध्यक्षों तथा क्षेत्रीय अध्यक्षों को बुलाया गया है। प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय जोशी भी रहेंगे। सात्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व ने पार्टी संगठन के तहत प्रदेश को 24 हिस्सों में बांटे गए इलाकों में 48 प्रमुख पदाधिकारियों को हार के कारणों की समीक्षा की जिम्मेदारी सौंपी थी।

पार्टी सूत्रों के अनुसार पूरे प्रदेश में भाजपा की हार के बारे में कार्यकताओं की राय लगभग एक सी है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि भाजपा ने भले ही मिशन 2012 का नारा बहुत पहले दिया हो लेकिन पूरा चुनाव इतना अव्यवस्थित तरीके से लड़ा गया कि इसका ओर-छोर पकड़ना मुश्किल हो रहा था। प्रत्याशियों की घोषणा में देरी की गई।  भितरघात ने काफी नुकसान पहुंचाया। एक जिलाध्यक्ष तो एक विधानसभा क्षेत्र में कई दिनों तक दूसरे दल का प्रचार कर रहे थे और पार्टी नेतृत्व को जानकारी देने के बावजूद कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गयी।

चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जा रहा है इसे लेकर भी भ्रम रहा। कभी उमा भारती को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया गया तो, कभी कलराज मिश्र और कभी सूर्य प्रताप शाही को। राजनाथ सिंह का भी प्रभाव कायम था।  ऐसे में कार्यकर्ता परेशान था कि किसे अधिक महत्व दे? बाबू सिंह कुशवाहा प्रकरण और  पार्टी नेताओं के बड़बोलेपन से भी वोटों का नुकसान हुआ। जनता के बीच पार्टी की विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया। सपा के घोषणापत्र पर मतदाताओं ने अधिक विश्वास किया जबकि भाजपा का घोषणापत्र उससे काफी बेहतर था। सूत्रों के अनुसार कई जिलों में पार्टी का घोषणापत्र पहुंचा ही नहीं।

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