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भ्रष्टाचार की जड़ और शाखाएं

कहने को कहते हैं कि आजादी के बाद देश में भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई, जबकि न हम आजादी के पहले कम भ्रष्ट थे और न ही उसके बाद ज्यादा हुए हैं। लोग कहते हैं कि गांधीजी की अगुवाई में देश में आदर्शवाद था। लोग सादगी पसंद थे। पैसे का लोभ कम था। लेकिन 1935  के इंडिया एक्ट के तहत, जब साल1937 में छह राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनी थीं, तब कांग्रेसी मंत्रियों के आचरण और भ्रष्टाचार से दुखी होकर गांधीजी ने कहा था, भयंकर भ्रष्टाचार से समझौता करने की जगह पूरी कांग्रेस को अच्छे से दफन करने के लिए मैं किसी भी हद तक जाऊंगा। गांधीजी ने यह बात 1939 में कही थी। तब जवाहरलाल नेहरू भी खिसियाकर बोले थे, भ्रष्टाचारियों और कालाबाजारियों को सबसे नजदीक के खंभे से लटका देना चाहिए।

नेहरूजी की पार्टी आज भी सत्ता में है और समाज के स्तर पर हाल यह है कि अब सरकार के खजाने को 11 लाख करोड़ रुपये का चूना लगने की बात खुद नियंत्रक व महालेखा परीक्षक यानी कैग कर रहा है। 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में 1.76 लाख करोड़ रुपये के घोटाले का खुलासा इसी कैग ने किया था। कॉमनवेल्थ गेम्स में 76 हजार करोड़ रुपये के घोटाले का मामला सामने आ चुका है। ए राजा अब भी जेल में हैं, जबकि सुरेश कलमाडी जेल की हवा खा चुके हैं और फिलहाल जमानत पर हैं। लेकिन इन घोटालों के खुलासे के पहले ही भ्रष्टाचार से आजिज आकर सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई, 2007 में टिप्पणी कर डाली थी कि एक ही तरीका है कि भ्रष्टाचारियों को लैंपपोस्ट से लटकाना पड़ेगा।

अब सोचिए, अगर आज नेहरूजी जिंदा होते, तो क्या करते? नेहरूजी के मंत्रिमंडल में भी भ्रष्टाचारी थे। ए डी गौरवाला की रिपोर्ट इस ओर साफ संकेत देती है। साल 1951 में गौरवाला ने योजना आयोग की अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि नेहरू की कैबिनेट में कुछ मंत्री भ्रष्ट हैं। और यह बात सबको पता थी। गौरवाला ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, कुछ काफी ऊंचे पदों पर बैठे नौकरशाहों ने उनसे कहा था कि सरकार ने ऐसे लोगों को बचाने के लिए सारे घोड़े खोल दिए थे।

इस बात की तस्दीक संथानम कमेटी की रिपोर्ट भी करती है। 1964 में अपनी रिपोर्ट में संथानम ने लिखा कि पिछले 16 साल में अत्यंत ऊंचे पदों पर बैठे कुछ मंत्री गलत तरीके से अमीर होते गए। गांधीजी व नेहरूजी के जमाने में ऐसे भ्रष्टाचारियों को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता था। लोग इतने बेशर्म नहीं थे। शर्म का एक आवरण जिंदा था। यही कारण था कि नेहरूजी ऐसे लोगों को खंभे से लटकाने की बात किया करते थे।

लेकिन उनके जाते ही कांग्रेस में और सरकार में शर्म की दीवार ढह गई। इंदिरा गांधी ने सरकार और सारी संस्थाओं को पंगु कर दिया। इंदिरा गांधी के कभी सलाहकार और दोस्त रहे रोमेश थापर ने प्रणय गुप्ते से एक इंटरव्यू में कहा था कि इंदिरा गांधी जब देश के पटल से गायब हुईं, तब तक उन्होंने सारी संस्थाओं को तहस-नहस कर दिया था। जेपी का आंदोलन महंगाई के खिलाफ कम और इंदिरा गांधी के भ्रष्टाचार के खिलाफ ज्यादा था।

इंदिरा गांधी के बाद कुछ बचा ही नहीं। गौरवाला नेहरू की कैबिनेट के कुछ मंत्रियों से परेशान थे, पर राजीव गांधी व नरसिंह राव की सरकारों ने सारी हदें पार कर दीं। 1995 तक भ्रष्टाचार के कारोबार ने एक निहायत मजबूत तंत्र खड़ा कर लिया था। नरसिंह राव के समय में चंद्रास्वामी और अदनान खगोशी की प्रधानमत्री से दोस्ती कोई शर्म की बात रह ही नहीं गई थी। ये लोग सरकार की नीतियां भी तय करने लगे। पूर्व गृह सचिव एन एन वोहरा ने 1995 में लिखा, एक माफिया तंत्र समानांतर सरकार चला रहा है, जिसने राज सत्ता को बेअसर कर दिया है। 

वाजपेयी के जमाने में बीजेपी के वे नेता सत्ता में थे, जिनके पीछे उस आरएसएस का हाथ था, जो राजनीति में शुचिता की वकालत किया करती थी। और देश की राजनीति के चाल, चरित्र और चेहरे को बदलने का दावा करती थी। लेकिन सत्ता का चरित्र ऐसा कि जब तहलका के पत्रकारों ने रक्षा दलाली का भंडाफोड़ किया, तो बजाय हथियार दलालों और घोटालेबाजों पर कार्रवाई करने के पत्रकारों को ही जेल भेजने की कोशिश की गई। अनिरुद्ध बहल आज भी अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। तहलका को फाइनेंस करने वाली कंपनी फर्स्ट ग्लोबल पर इतने छापे पड़े कि वह दिवालिया हो गई, जबकि रक्षा सौदों में दलाली की पूरी तस्वीर देश ने देखी।

तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को पैसे लेते हुए सबने कैमरे पर देखा। बंगारू आज भी आजाद हैं। साथ ही आजाद घूम रहे हैं दिलीप सिंह जूदेव। जूदेव भी पैसे लेते पकड़े गए थे। जब कहीं कोई कार्रवाई नहीं होगी, उलटे पैसे लेने वाले जूदेव को सांसद बनने का मौका दिया जाएगा, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई संसद के अंदर बैठे बीजेपी और कांग्रेस के नेता लड़ेंगे, यह उम्मीद हम कैसे पाल लें? हम पत्रकारों को यह बताने की जरूरत नहीं है कि हर राज्य के मुख्यमंत्री का एक कोटा फिक्स कर दिया जाता है, उसे आलाकमान तक पैसे पहुंचाने ही होते हैं। तर्क होता है कि पार्टी चलाने और चुनाव लड़ने के लिए पैसों की जरूरत होती है।

सोचिए, जब पैसे उगाहने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों के सिर पर होगी, तो भ्रष्टाचार पर लगाम कौन लगाएगा? और जब अन्ना और उनकी टीम कहती है कि देश की कैबिनेट में 14 मंत्री दागी हैं, तो उन्हें पागल कहा जाता है। कौन हैं यह कहने वाले? लालू यादव और मुलायम सिंह यादव। लालू चारा घोटाले में जेल जा चुके हैं। और मुलायम के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में तीन साल से फैसला सुप्रीम कोर्ट में रिजर्व है।

ऐसे में, मेरा तो यह मानना है कि हमें भी अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, विनोद राय और जनरल वी के सिंह को भ्रष्ट घोषित कर खुद को ईमानदार होने का सर्टिफिकेट हासिल कर लेना चाहिए, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का नाटक करने वाले ये लोग असल में देशद्रोही हैं और राजा, सुरेश कलमाडी, मधु कोड़ा, कनिमोझी जैसों को भारत रत्न से सम्मानित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेनी चाहिए!
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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