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विकास की डगर पर साइकिल का सफर

पार्टी दफ्तर में मंत्रियों की क्लास लगी है। दल के आका की नसीहत है- ‘अवाम के बीच जाइए। यह जरूरी है कि उन्हें माहौल में बदलाव महसूस हो। घोषणापत्र के हर आश्वासन पर हमें अमल करना है। सिर्फ नारे लगाना और उत्सव के उल्लास में बम-पटाखे फोड़ना ही काफी नहीं है। जनता का क्या भरोसा? आज सिर पर चढ़ाया है, कल वनवास दे दे।’ मंत्री चिंतित हैं। इतने दिनों बाद तो कुरसी पाई है। चुनाव का खर्चा भी निकालना है। आका बड़े हैं। सत्ता के शिखर से उपदेश ऐसे झरते हैं, जैसे पतझर में पत्ते। कह दिया, पारदर्शिता लाओ, भ्रष्टाचार कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। ऊंचे पेड़ से फल और बड़ों के मुंह से सुभाषित ही शोभा देते हैं।

सड़क पर कई अफसर चक्कर लगा रहे हैं। मलाई तो खास करीबियों ने खाई है। उन्हें तो छाछ तक नहीं मिली। बिना रोए तो मां तक बच्चे को दूध नहीं पिलाती। मौका मिल, तो वे भी निजी प्रताड़ना का रोना रोएं। पहले इफरात थी वक्त की, अब उन्हें फुरसत ही नहीं है। लेकिन इन्होंने कई चुनौतियां ङोली हैं। इन्हें आदत है इंतजार करने की। कभी न कभी तो आला नेता पकड़ में आएगा ही। कब तक बधाइयों के बंधन में रहेगा? जैसे ही छूटा, वे धर दबोचेंगे। सत्ताधारी विवश हैं। उन्हें भी कद का अहसास, जनता नहीं, खुशामदी ही दिलवाते हैं। पहले सिर्फ अपने आते थे, अब रेला है। इस रेले में अजनबी, यहां तक कि कल के दुश्मन तक शामिल हैं।

जनता को परिवर्तन से प्रगति की अपेक्षा है! सड़क, बिजली, पीने का पानी, इलाज की सुविधा। अनुभवी मंत्री अफसरों के चकमों से परिचित हैं! कहां धांधली करते, कहां कमाते हैं। वह खुद रहा है जेल में। जानता है कि कैदी की जिंदगी जानवर से बदतर है। अपराधी पुलिसिया हथकंडों के विशेषज्ञ हैं। इनका कुरसी पर होना आशा जगाता है। वह प्रशासन से वाकिफ हैं। हवाई बातों के मुकाबले हनक से काम होगा। साइकिल पर बोझ ही बोझ है, कुछ तो सत्ताधारी नेताओं का, अधिक सामान्य जन की उम्मीदों का। रास्ते में धनाभाव के कांटें हैं। व्यापक भ्रष्टाचार के गड्ढे हैं। सभी चाहते हैं, साइकिल मंजिल की ओर चले। डरते हैं कि बीच में ही कहीं पंचर न हो जाए! कई बार छले जो गए हैं।
गोपाल चतुर्वेदी

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