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खुद पर हंसें

स्वस्थ मजाक वह है, जो अपने पर किया जाता है। दूसरों पर हंसना रोग है, खुद पर हंसना आरोग्यकारी होता है। अंग्रेजी में इसे ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ कहते हैं। इसे सकुशल जीवन पार करने की नैया ही समझ लें। ओशो ने सबसे पहले हास्य को एक ध्यान विधि बनाकर अपने प्रवचनों में स्थान दिया है। हर प्रवचन के अंत में वह तीन-चार चुटकुले जरूर सुनाते।

उनका मानना था कि हास्य में अद्भुत क्षमता है, सेहत दुरुस्त करने की और ध्यान में डुबोने की भी। वह निश्चित ही शरीर के भीतर के तत्वों और मस्तिष्क की विद्युत-तरंगों में परिवर्तन लाता है, प्रतिभा को जगाता है। आप ज्यादा बुद्धिमान हो जाते हैं। मन के वे हिस्से, जो सोए पड़े थे, अनायास जाग उठते हैं। हंसी आपके दिलो-दिमाग की गहराइयों में प्रवेश कर जाती है। देखा गया है कि हंसने वाले लोग आत्महत्या नहीं करते, उन्हें दिल के दौरे नहीं पड़ते, वे सहज ही मौन के जगत को जान लेते हैं, क्योंकि हंसी के थमते ही अचानक मन भी थम जाता है।

अब शरीर पर होनेवाले हास्य के वैज्ञानिक प्रभाव पर काफी खोजबीन हो रही है और डॉक्टरों ने हास्य को बहुत स्वास्थ्यदायी माना है। चिकित्सा विज्ञान भी कहने लगा है कि हंसी, मनुष्य को प्रकृति से भेंट में मिली सबसे असरदार औषधि है। यदि बीमारी के दौरान हंस सकें, तो आप जल्दी ही स्वस्थ हो जाएंगे और अगर स्वस्थ रहकर भी नहीं हंस पाए, तो शीघ्र ही आपका स्वास्थ्य खोने लगेगा और बीमारी घेर लेगी।

हास्य आंतरिक स्रोत से शक्ति को जगाकर बाह्य तल तक ले आता है। फिर हंसी के पीछे छाया की तरह एक ऊर्जा की धारा प्रवाहित होती है। डॉक्टर यहां तक कहते हैं कि जो आदमी सात दिन में एक बार भी नहीं हंसता, वह मनोरोग से ग्रसित हो सकता है। मनुष्य एकमात्र विवेकशील प्राणी है, जो खुद पर भी हंस सकता है।
अमृत साधना

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