DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पान सिंह तोमर होना

पान सिंह तोमर फिल्म अपने जैसे कथानक वाली फिल्मों के साथ खड़ी होकर एक और पहलू सामने रखती है। पान सिंह की कहानी क्या केवल इसलिए कही जाए कि उसने पदक जीते थे, वह एक फौजी था और एक खिलाड़ी भी? क्या राष्ट्रीय बोध, राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय धरोहर, राष्ट्रीय गौरव जैसे शब्द केवल पदक पाने वाले चंबल के इस नौजवान की जिंदगी से ही जुड़े हैं?

राष्ट्रीय अभिमान अगर हमारे दिल में इतना ही लबरेज है, तो इसे हर एक व्यक्ति के साथ हो रहे अन्याय और अपमान पर छलकना चाहिए, चाहे वह पान सिंह तोमर हो या न हो। पर हम ऐसा नहीं करते। इसलिए फूलन की मौत पर हम कहते हैं कि डकैत थी, मारी गई। जो गोली चलाता है, वह गोली से ही मारा जाता है। पर पान सिंह तो विशेष था। उसे नहीं मारा जाना चाहिए था। कितनी दर्दनाक है उसकी कहानी। अरे, ददुआ और फूलन की कहानी का दर्द क्या पान सिंह के दर्द से कम है?

क्या बेहमई में हुई घटना राष्ट्रीय गौरव को तार-तार नहीं कर देती? फूलन और पान सिंह तोमर एक ही भौगोलिक दंगल के बागी थे। दोनों के कारण अलग-अलग थे, पर दोनों के कारणों की साझा नींव अन्याय, शोषण, उपेक्षा, अत्याचार और व्यवस्था में सब कुछ व्यवस्थित होने का ढोंग ही है। इसीलिए फूलन भी बंदूक उठाती है, ददुआ भी और पान सिंह भी। आप और हम चंद नामों को जानते हैं। ऐसे कितने ही नाम एनकाउंटरों की फाइलों में हैं, सीखचों के पीछे हैं या गाहे-बगाहे अपनी हरकतों से पहचाने जा रहे हैं।
प्रतिरोध में पाणिनि आनंद

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:पान सिंह तोमर होना