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अज्ञान का स्वाद

सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवॉयर्नमेंट (सीएसई) की ताजा रपट लोकप्रिय फास्ट फूड ब्रांड को कठघरे में खड़ा करती है। उनकी रपट यह कहती है कि कई फास्ट फूड ब्रांडों में ट्रांस फैट, चीनी और नमक की मात्र काफी ज्यादा है और ये कंपनियां विज्ञापनों में और पैकेटों पर या तो इसकी जानकारी नहीं देतीं या फिर गलत देती हैं। ऐसा नहीं है कि इस बारे में कोई नियम है कि ट्रांस फैट, चीनी या नमक की कितनी मात्र किसी खाद्य पदार्थ में हो सकती है, आखिरकार ऐसा कोई नियम नहीं हो सकता कि समोसे में कितना फैट होगा या गुलाब जामुन में कितनी चीनी डाली जा सकती है।

लेकिन वैज्ञानिक यह बताते हैं कि इन चीजों की कितनी मात्र दिन भर में सुरक्षित है। मसलन मोटा नियम यह है कि आहार में ज्यादा से ज्यादा तीस प्रतिशत ऊर्जा फैट से मिलनी चाहिए, इस फैट में ट्रांस फैट की मात्र 2.1 से 2.6 तक सुरक्षित है। लेकिन अगर आपको यह जानकारी ही नहीं होगी कि जो कुछ आप खा रहे हैं, उसमें ट्रांस फैट कितना है, तो आप अनजाने में ज्यादा खा जाएंगे। बाजार में जो खाद्य पदार्थ होते हैं, वे घर के बनाए खाद्य पदार्थों से ज्यादा चटपटे होते हैं, तभी लोग इन्हें खरीदते हैं। यह चटपटापन अक्सर ज्यादा चीनी, ज्यादा नमक और ट्रांस फैट से भी आता है। कई खाद्य पदार्थ ऐसे हैं, जिन्हें तलते समय ज्यादा ट्रांस फैट वाला तेल या घी न इस्तेमाल किया जाए, तो उनका स्वाद उतना अच्छा नहीं होता।

मुद्दा यह है कि खाद्य पदार्थ बनाने वाले सही-सही जानकारी उपभोक्ता को दें। बाजार में समोसा बेचने वाले या चाट-पापड़ी का ठेला लगाने वाले से आप यह उम्मीद नहीं करते, लेकिन अगर कोई खाद्य पदार्थ हजारों करोड़ रुपये का व्यापार करने वाली कंपनी ने बनाया है, तो उससे आप सही जानकारी की उम्मीद करते हैं। अगर वह कंपनी बहुराष्ट्रीय है, तो उससे हम यह भी उम्मीद करते हैं कि वह एक देश में सुरक्षा के जिन मानकों का इस्तेमाल करती है, दूसरे देशों में भी उन्हें ही लागू करेगी, आखिरकार स्वास्थ्य मूल्य तो हर जगह एक सा है। लेकिन ये कंपनियां हर देश में सुरक्षा कानूनों में पेच ढूंढ़कर उनका इस्तेमाल करना चाहती हैं, उनका तर्क यह होता है कि हम हर देश  में वहां के कानून का पालन करते हैं।

अगर सरकार नागरिकों के प्रति अपना कर्तव्य समझती है, तो उसे सख्त मानदंड बनाने और उन्हें सख्ती से लागू करने चाहिए। कई कार कंपनियां भारत में बेची जाने वाली कारों में सुरक्षा के इंतजामों में कटौती करती हैं, जबकि खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियां स्वास्थ्य के नियमों को सख्ती से लागू नहीं करतीं। हमें दुनिया के अग्रणी देशों में शुमार होना है, तो दूसरे दर्जे या खराब स्तर की चीजें या सेवाएं स्वीकार नहीं करनी चाहिए। यह सतर्कता जरूरी है कि विज्ञापनों के जोर पर बिकने वाली खाद्य सामग्री क्या नुकसान कर सकती है। पहले ही भारत में हृदय रोग, मधुमेह और ऐसी तमाम बीमारियों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जो हमारे जजर्र स्वास्थ्य तंत्र पर अतिरिक्त बोझ है।

इन खाद्य पदार्थों के खतरों से हम काफी हद तक इसलिए बचे हुए हैं, क्योंकि भारत में भोजन रोज रसोई में ताजा बनता है और फास्ट फूड कभी-कभार खाया जाता है, जबकि पश्चिम में रसोई का अर्थ वह जगह है, जहां बाजार से लाया गया खाना गरम किया जाता है। हालांकि अब यहां भी बाजार के खाने का प्रचलन बढ़ रहा है, लेकिन हमारी रसोई हमारा बहुत बड़ा और मजबूत कवच है। आधुनिक युग में इस कवच को कैसे मजबूत किया जाए, यह सोचना होगा और इसे प्रोत्साहित करना होगा और साथ ही फास्ट फूड निर्माताओं पर सही जानकारी देने के लिए सख्ती करनी होगी।

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