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हादसों की सड़क

पिछले दिनों ‘सड़क पर खून’ शीर्षक संपादकीय पढ़ा। इस संपादकीय ने उन लोगों के विचारों को पुष्ट किया है, जो यह मानते हैं कि आज के युवा बेलगाम और बेपरवाह होते जा रहे हैं। वाकई, पैसे का नशा आज के युवाओं के सिर चढ़कर बोल रहा है। इसलिए तो सड़क हादसों की तादाद साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। यह समझ से परे है कि क्यों युवा सड़क पर अपनी बादशाहत दिखाने पर आमादा रहते हैं? वे सड़क पर किस काबिलियत को सिद्ध करना चाहते हैं? यकीनन, उभरती हुई धनाढय़ शैली की वजह से हमारे युवा बिगड़ैल हो गए हैं। इसे समझने के लिए संपादकीय की अंतिम पंक्ति पर गौर करें ‘हमारे समाज ने लोगों को वाहन तो उपलब्ध करा दिए हैं, लेकिन तहजीब पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।’ निस्संदेह, आज अधिकतर अभिभावकों के पास बच्चों की खुशी पर लुटाने के लिए पैसे तो हैं, पर इनके लिए उनके पास वक्त नहीं है। उम्मीद तो यही है कि हम बच्चों की खुशियों पर ध्यान देने के साथ-साथ उन्हें जीवन मूल्यों का भी ज्ञान प्रदान करें। मुझे जीना है, तो औरों को भी जीने का वैसा ही अधिकार है, इस भाव को उन्हें समझाना बहुत जरूरी है। जीवन में इसे आत्मसात करने के बाद ही वे किसी की जान को कभी खतरे में नहीं डालेंगे। 
कमलेश तुली, द्वारका, नई दिल्ली

परंपरा के नाम पर
कर्नाटक के धारवाड़ जिले के बीरबल्ली गांव में होली के एक सप्ताह बाद अंगारों की होली खेली जाती है। एक किंवदंती के अनुसार,  इस गांव में भगवान शिव के तीन भाइयों का अवतार हुआ था, जो आपस में सदैव लड़ते-झगड़ते रहते थे, पर बाद में एक हो गए। इसी मान्यता को मनाने के लिए गांववासी पहले शिव मंदिर में जाकर भगवान का आशीर्वाद लेते हैं, उनके तीनों भाइयों का स्मरण करते हैं, तत्पश्चात एक खुले स्थान पर अंगारे तैयार करते हैं। इसके बाद भगवान शिव की पालकी को लेकर दो-तीन लोग तेजी से अंगारों के ऊपर से निकलते हैं। फिर इसके बाद श्रद्धालु अंगारों के ऊपर से निकलते हुए एक-दूसरे पर अग्नि के गोले फेंकते हैं। इस दौरान कई लोग जख्मी हो जाते हैं, झुलस जाते हैं, पर लोग इसे भगवान का आशीर्वाद मानते हैं। अंधविश्वास की यह होली सदियों से खेली जा रही है। आखिर, परंपरा के नाम पर यह सब कब तक चलता रहेगा?
जसवंत सिंह, शांतिकुंज, नई दिल्ली

मासूम पर जुल्म
पिछले दिनों कुछ ऐसी खबरें आईं, जिनसे यह साफ हो गया कि देश भर के विद्यालयों में बच्चों पर जुल्म आम बात है। हालांकि कानून के मुताबिक, बच्चों को दंड देना जुर्म है। हमारी संस्कृति भी बच्चों को शारीरिक दंड को गलत मानती है। पर न जाने क्यों आजकल डंडे के बल पर अनुशासन व पढ़ाई पर जोर दिया जाता है। बेहतर तो यही है कि शिक्षक सजा देने के बदले बच्चों को प्यार से समझाएं। माता-पिता को भी ख्याल रखना होगा कि स्कूल में बच्चा परेशान तो नहीं हो रहा है। हम जानते हैं कि बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं। फिर भविष्य से खिलवाड़ क्यों?
गौतम चौरसिया, भरत नगर, दिल्ली

विवादों में जनरल
जितनी जल्दी रिश्वत प्रकरण मामले को सुलझा लिया जाए, वही बेहतर है। इस प्रकरण से फौज की बदनामी तो हो ही रही है, केंद्र सरकार पर भी सवाल उठ रहे हैं। साथ ही साथ सेना और सरकार के बीच के रिश्ते बिगड़ते नजर आ रहे हैं। यह लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं। फौज और सरकार, दोनों के काम बंटे हुए हैं और दोनों अपने-अपने काम पर ध्यान दें।
रश्मि सिन्हा, मॉडल टाउन, दिल्ली

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