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सत्यजित रे निर्दय निदेशक थे : संदीप

प्रख्यात फिल्मकार सत्यजीत रे के निधन के दो दशक बाद उनके पुत्र ने कहा है कि अपने पिता से विरासत मिला 'निर्दय निर्देशक' का हुनर फिल्मकार के रूप में उनकी सफलता का प्रमुख कारण रहा।

संदीप रे ने विशेष बातचीत में कहा कि मैंने अपने पिता और उनकी टीम के सदस्यों से अनेक बातें सीखी हैं, जिनसे मुझे काफी मदद मिली है। लेकिन जिस एक बात ने मेरी मदद की वह यह कि वह हमेशा कहते थे कि किसी निर्देशक को निर्दयी होना चाहिए और उसे कभी किसी दृश्य या शॉट के प्रति लगाव नहीं होना चाहिए।

संदीप ने कहा कि वह कहा करते थे कि किसी भी निर्देशक को उदार होना चाहिए और 'फेटलैस मूवीज' बनानी चाहिए। उनके शब्द मुझे अभी भी याद हैं कि कोई निर्देशक दर्शक को बोझिल नहीं कर सकता।

संदीप के अनुसार, परम्परा तोड़ने की क्षमता, जोरदार विषय और कहानी को सहज रूप में कहने की कला ने सत्यजित रे को उत्कृष्ट फिल्में बनाने में मदद की, जिन्हें विश्वस्तरीय फिल्मों की कसौटी माना जाता है।

देश के पहले और एक मात्र आस्कर विजेता निर्देशक, सत्यजित रे ने अपनी कालातीत फिल्मों- 'अपु ट्रायोलॉजी', 'जलसाघर', 'सोनार केला', 'चारुलता', और 'शतरंज के खिलाड़ी' के जरिए सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी फिल्म प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित किया। उनका जन्म मई 1921 में हुआ था और अप्रैल 1992 में उनका निधन हो गया।

अपने पिता के सहायक के तौर पर फिल्म जगत में कदम रखने वाले संदीप ने अपनी पहली फिल्म 1983 में 'फटिकचंद' बनाई थी। सत्यजित रे जब एक हृदयाघात के बाद बीमार हुए तो संदीप उनकी अंतिम तीन फिल्मों के लिए डाइरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी की भूमिका निभाई। ये तीनों फिल्में थीं- 'गणशत्रु', 'शाखा प्रोशाखा' और 'आगंतुक'।

संदीप ने 1991 में 'गूपी बाघा ट्रायोलॉजी' के तीसरे भाग 'गूपी बाघा फिरे एलो' का निर्देशन किया। फिल्म का संगीत रे ने तैयार किया था और कहानी पर पिता-पुत्र दोनों ने मिलकर काम किया था। संदीप स्वीकार करते हैं कि उनके पिता के कद ने प्रारम्भ में उनके लिए रास्ते थोड़े कठिन कर दिए थे।

संदीप ने कहा कि जी हां, यह सच है कि प्रारम्भ में यह बात मुझे थोड़ा परेशान करती थी, और मैं अत्यधिक सतर्क रहता था। दरअसल, जब आप इस तरह के किसी महान फिल्मकार के पुत्र होते हैं तो आप के ऊपर अतिरिक्त दबाव होता है। लेकिन आगे चलकर मैंने इस बारे में सोचना बंद कर दिया और, यह महसूस करके मुझे खुशी होती है कि मैं अपने लिए एक स्थान बनाने में सफल रहा।

संदीप 'निशिजापन' और 'उत्तोरन' जैसी फिल्मों के जरिए अपनी खुद की  पहचान बनाने में सफल रहे। 'बाम्बायर बाम्बेते' और 'बक्शो रहस्य' जैसी अत्यंत सफल फिल्मों से उन्होंने फिल्म उद्योग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

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