DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

गरीब तो घटे, पर गैरबराबरी बढ़ी

सरकार ने गरीबों की संख्या के जो ताजा आंकड़े पेश किए हैं, उनसे एक साथ दो संदेश मिलते हैं। इनमें से एक अच्छी खबर है और दूसरी बुरी खबर। सबसे पहले अच्छी खबर को देखते हैं। अगर कुल-जमा ढंग से देखें, तो देश में ग्रामीण और शहरी दोनों ही तरह की गरीबी कम हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर यह 7.4 फीसदी कम हुई है। 2004-05 में यह 37.2 फीसदी थी, जो 2009-10 में घटकर 29.8 फीसदी हो गई। इस दौरान ग्रामीण गरीबी 41.8 फीसदी से घटकर 33.8 फीसदी हो गई, जबकि शहरी आबादी में गरीबों की संख्या 25.7 फीसदी से घटकर 20.9 फीसदी रह गई। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि सरकारी आंकड़ों के हिसाब से अब देश के गांवों में हर तीन में से एक आदमी गरीब है।

शहरों में हालात इससे थोड़े से बेहतर हैं। वहां तो हर पांच में से एक गरीब है। ये आंकड़े साल 2011 की जनगणना के नतीजों से भी मेल खाते हैं, जो घर-घर जाकर जमा किए गए थे। पिछले दिनों मिंट की एक रिपोर्ट में भी यह साफ तौर पर बताया गया था कि भारत ऊपर की ओर खिसक रहा है, भले ही ऊपर उठने  की जो यह प्रक्रिया है, उसमें बराबरी नहीं है।

इसका अर्थ हुआ कि राष्ट्रीय स्तर पर हम पहले से बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन क्या इतना पर्याप्त है? शायद नहीं, खासकर तब, जब आर्थिक विकास दर तेजी से गिरी है। इसलिए भी नहीं कि हाल ही में पेश किए गए बजट में जो जोखिम बताए गए हैं, अगर वाकई हकीकत बन गए, तो वाकई परेशानी और भी बढ़ सकती है।

और अब एक सचमुच की बुरी खबर यह है कि गरीबी में यह कमी सब जगह एक जैसी नहीं है। इसमें क्षेत्रीय असमानताएं तो साफ जाहिर होती ही हैं। आबादी के हिसाब से गरीबी का वितरण देखें, तो इसमें देश की नीतियों में मौजूद कई खामियों की झलक भी मिलती है। वैसे यह ठीक है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे देश के बड़े राज्यों में गरीबी कम होने के मामले में कुछ प्रगति दिखाई दी है। जबकि ये राज्य इस मामले में परंपरागत रूप से काफी पिछड़े हुए थे। ताजा आंकड़े बताते हैं कि अल्पसंख्यक और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति जैसे हाशिये पर रहने वाले समुदाय अभी देश के गरीबों का बड़ा हिस्सा हैं। कोई भी प्रदेश जितना गरीब है, उतने ही ज्यादा इन समुदायों के लोग गरीब हैं। बिहार और छत्तीसगढ़ के गांवों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के हर तीन में से दो लोग गरीब हैं। जबकि मणिपुर, ओडिशा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अनुसूचित जाति और जनजाति के गरीबों का अनुपात दो में एक का है।

इससे भी ज्यादा चिंता की बात है, शहरी इलाकों में दिहाड़ी मजदूरों की खतरनाक ढंग से बढ़ती गरीबी। योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार, बिहार के शहरी इलाकों के दिहाड़ी मजदूरों में 86 फीसदी, असम के दिहाड़ी मजदूरों में 89 फीसदी, ओडिशा के दिहाड़ी मजदूरों में 58.8 फीसदी, पंजाब में 56.3 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 67.6 फीसदी, और पश्चिम बंगाल में 53.7 फीसदी शहरी दिहाड़ी मजदूर गरीब हैं।

अब एक नजर डालते हैं, रोजगार के उन आंकड़ों पर, जो पिछले साल नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन यानी एनएसएसओ ने जारी किए थे। इन आंकड़ों से हमें दो चीजें पता पड़ती हैं। एक तो यह कि हालांकि 2009-10 को खत्म हुए पांच साल का दौर देश के इतिहास का सबसे ज्यादा आर्थिक विकास वाला दौर रहा, लेकिन इस दौरान रोजगार के नए अवसर या तो बहुत कम पैदा हुए या फिर नहीं ही पैदा हुए। जब ये आंकड़े जारी हुए, तो बहुत से लोगों ने इन आंकड़ों पर सवाल उठाए थे। इसलिए यहां यह बता देना जरूरी है कि उस समय जॉब लेस ग्रोथ यानी रोजगारहीन विकास की बात करने वाले नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन ने ही उपभोग के वे आंकड़ें जुटाए हैं, जिनके आधार पर गरीबी की गणना हुई है और यह नतीजा निकाला गया है कि देश में कुल-जमा गरीबी कम हुई है।
नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों से दूसरी जो चीज हमें पता पड़ी, वह यह थी कि देश में श्रमिक बल की गुणवत्ता काफी तेजी से गिरी है। इस दौरान हमारे श्रमिक बल का ज्यादा बड़ा हिस्सा दिहाड़ी मजदूरों का ही रहा है। 2004-05 से लेकर 2009-10 के बीच दिहाड़ी मजदूरों की संख्या लगभग 22 करोड़ बढ़ी है। जबकि इसके मुकाबले नियमित कर्मचारियों की संख्या बढ़ने की दर इसकी आधी रही है। (ये आंकड़ें उसके पहले के पांच वर्ष यानी 1999-2000 से लेकर 2004-05 की तुलना के आधार पर निकाले गए हैं।) और कुल संख्या के हिसाब से देखें, तो यह महज 5.8 करोड़ ही बढ़ी है। इसी दौरान स्व-रोजगार में लगे लोगों की संख्या लगभग 25 करोड़ कम हुई है। इनमें सबसे ज्यादा संख्या खेती में लगे लोगों की है।

इन सारे आंकड़ों को जोड़कर देखें, तो एक ही चीज समझ में आती है कि वंचित लोगों का जीवन स्तर इस दौरान काफी तेजी से गिरा है। और हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि भारत में इस दौरान गरीबी बढ़ी है। इन सबका कुल-जमा विश्लेषण करने पर जो बात सामने आती है, वह यह है कि संख्या के स्तर पर इस देश में गरीबी निश्चित तौर पर कम हुई है। लेकिन अगर हम और गहराई से देखें, तो इस दौरान देश में गरीबों और अमीरों के बीच की खाई भी काफी बढ़ गई है। निश्चित तौर पर यह चिंता का बहुत बड़ा मसला है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:गरीब तो घटे, पर गैरबराबरी बढ़ी