DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

समाज अब किसी को ‘बड़ा’ नहीं बनने दे रहा

अस्सी के दशक में एक किताब बाजार में आई थी- ‘उत्तर आधुनिकतावाद और विखंडन का सिद्धांत’। इस किताब में फ्रांस के महान विचारक देरिदॉ ने जो बात कही थी, वर्तमान हालात उन्हीं विचारों के आस-पास करवट लेते दिख रहे हैं।

किताब में उन्होंने जिस विखंडन के सिद्धांत की बात कही थी, उसका लब्बोलुआब यह था कि धीरे-धीरे संसार के सारे समाज ऐसा रूप धारण कर लेंगे कि वे किसी को भी ‘बड़ा’ नहीं बनने देंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो, अब किसी देश या समाज का कोई नेता नहीं होगा। प्रदेश का भी कोई नेता नहीं होगा। हां, किसी जाति विशेष का नेता हो सकता है। फिर भले ही वह उस जाति के प्रभाव की वजह से राज्य सत्ता में भागीदार बन जाए। मसलन, भारत की बात करें, तो तमाम जातियों और समुदायों का कोई नेता हो सकता है। जैसा कि चुनाव के दौरान हमें दिखता भी है। सिखों और मुसलमानों के कुछ समूहों के भी नेता हो सकते हैं। तमिलों, बंगालियों और मराठियों के नेता भी हो सकते हैं। लेकिन देश का नेता कोई नहीं बन पाएगा। इसके पीछे मुख्य वजह सामाजिक ढांचा होगा, जो किसी को बड़ा बनने के लिए सपोर्ट नहीं करेगा। साहित्य की भाषा में यह कुछ-कुछ वैसा ही होगा, जैसा धरती का वीर विहीन हो जाना।

यानी थोड़ा दूसरे ढंग से सोचें, तो देरिदॉ जैसे विचारक बहुत पहले ही यह जान गए थे कि भविष्य में टांग खिंचाई इतना बड़ा रूप धर लेगी कि सिर्फ तिकड़मी लोग ही आगे बढ़ पाएंगे। नतीजतन, कोई ऐसी दूसरी पांत तैयार नहीं हो पाएगी, जो समाज को दिशा देने वाली बने। भारतीय राजनीति में यह बात कई जगहों पर दिख भी रही है, जहां पुराने बड़े नेता बुजुर्ग हो गए हैं और नई पौध सिर्फ पहले से स्थापित लोगों के परिवारों से ही सामने आ रही है। जाहिर है, कोई अपने दम पर बड़ा बनते हुए कतई नहीं दिख रहा।

वैसे, यह विश्लेषण सिर्फ राजनीति के लिए हो, ऐसा भी नहीं है। इन दिनों हर क्षेत्र में यही हो रहा है। पिछले दिनों इंफोसिस के प्रणेता नारायणमूर्ति ने भी इस बात की ओर इशारा किया था कि समाज में ऐसे व्यक्तित्वों की कमी है, जिन्हें आज के युवा अपना आदर्श बना सकें। इसीलिए वे भ्रष्ट और गलत तरीके से आगे बढ़ने वाले लोगों को अपना आदर्श बनाने को मजबूर हैं।

लगभग यही बात विखंडन का सिद्धांत भी कहता था। हालांकि ज्यादातर लोग दुनिया की इस टेढ़ी चाल को कोसते दिख जाते हैं, लेकिन यह वही परिवर्तन है, जिसे महान लोगों ने सदियों और दशकों पूर्व ही सूंघ लिया था। यह समाज में होने वाले परिवर्तन हैं, जो तमाम दूसरे बदलावों की तरह हमें तत्काल नजर नहीं आते हैं। यह दशकों और शताब्दियों में धीरे-धीरे होते हैं। लेकिन फिर भी हम एक बड़े वक्त के परिवर्तन के साक्षी बन रहे हैं, जहां रुपयों से जुड़ी तरक्की सैद्धांतिक और संस्कारित तरक्की से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।

 

 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:समाज अब किसी को ‘बड़ा’ नहीं बनने दे रहा