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शांति का नाटक

शांति चाहने वाले लोग बहुतेरे मिल जाएंगे। सच तो यह है कि शायद ही दुनिया में कोई हो, जो स्वीकार करे कि उसे शांति नहीं चाहिए। ऐसे में, आखिर क्या वजह है कि अशांति के कई टापू हमारी दुनिया में हैं। फलीस्तीन, कश्मीर तो बड़े हैं, हजारों-लाखों छोटे टापू भी हैं। पड़ोस में चार भाइयों का एक परिवार है। चारों भाई एक छोटे से भूखंड को लेकर वर्षों से एक-दूसरे के प्रति मनमुटाव पाले हैं। न उनके मन में और न घर में शांति है। लेकिन बात करने पर यह लगता कि चारों शांति चाहते हैं।
इसका जवाब ‘अ न्यू अर्थ’ किताब में एक्हर्ट टल्ल देते हैं। वह कहते हैं कि हमारे भीतर शांति चाहने वाली शक्ति से कहीं अधिक ताकतवर ‘शांति का नाटक’ चाहने वाली शक्ति है। इस ताकतवर शक्ति को संघर्ष चाहिए। यह जबर्दस्त प्रतिक्रियावादी है। एक्हर्ट आगे कहते हैं कि यह शक्ति आरोप को प्रत्यारोप और प्रश्न को प्रतिप्रश्न में बदलती रहती है। इसे इस बात की जिद होती है कि आपको विजयी पात्र बनाया जाए। दरअसल, खुद को विजयी बनाने की सोच हमें हमेशा एक मानसिक युद्ध के स्तर पर पहुंचा देती है। ऐसा सामूहिक स्तर पर भी संभव है। ‘हम सही हैं और वे गलत’ इस सामूहिक सोच ने मानवता को काफी चोट पहुंचाई है। इसने दो देशों, दो जातियों, दो समुदायों और यहां तक कि दो परिवारों को उग्र सोच दीं। इसने उग्र प्रतिस्पर्धात्मक परिवेश को पैदा किया।
जब सबसे ज्यादा तनातनी होती है, तो शांति की बात भी सबसे अधिक होती है। दरअसल, तब ‘शांति का नाटक’ भी चरम पर होता है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने गलत नहीं कहा है कि शांति किसी समझौते पर नहीं, आपकी चाह पर निर्भर करती है। चाह पैदा करना आसान नहीं, क्योंकि ऐसा होता, तो सभी बुद्धत्व को हासिल होते। लेकिन यह याद रखें, बुद्धत्व का बीज हम सबमें है और इसकी रोपाई हम पर ही निर्भर है।

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  • Web Title:शांति का नाटक