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निराश करने वाला बजट

पिछले दशक में भारत की विकास दर ने ऊंची दर हासिल की थी, अब वह गिरती जा रही है। लेकिन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी जिस तरह की आंकड़ेबाजी कर रहे हैं, आप इसे आसानी से भांप नहीं पाएंगे। पिछले शुक्रवार को पेश उनके बजट में ऐसा कुछ भी नहीं था, जो आर्थिक सुधारों को प्रोत्साहित कर सके, लेकिन उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च का दायरा बढ़ाने का काम जारी रखा। जाहिर है, भारत सरकार करदाताओं की जेबतराशी के जरिये ही इन योजनाओं को जारी रख सकती है। शेयर व बॉन्ड बाजार, दोनों ही बेहतरी की आस लगाए हुए थे और बजट के आते ही इनकी उम्मीदें धाराशायी हो गईं। पिछले नौ वर्षो में वर्ष 2011-12 में भारतीय विकास दर सबसे खराब रही और वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में तो यह 6.1 फीसदी दर्ज की गई है। कॉरपोरेट निवेश के थमते ही मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को गहरा धक्का लगा है। गौरतलब है कि बीते दशक में विकास की आंधी कॉरपोरेट निवेश की वजह से ही आई थी। इसके जवाब में प्रणब मुखर्जी बस लक्षित रियायतों की पेशकश कर रहे हैं। वर्ष 2009 से नई दिल्ली ने पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में कड़े फैसले लेने शुरू किए। किसी भी बड़े उद्योग-धंधे को नए अवसरों को खोलने की आजादी नहीं दी गई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले साल किराना कारोबार में विदेशी निवेश की अनुमति देने की कोशिश भी की, तो विपक्षी सांसदों ने हंगामा मचा दिया। नतीजतन सरकार को झुकना पड़ा। आर्थिक स्थिति को देखते हुए वित्त मंत्री ने सख्त निर्णय लेने की बात कही है। पर लोक कल्याणकारी नीतियों के विपरीत जाना सरकार के लिए आसान नहीं है। पिछले साल उन्होंने जीडीपी का 1.5 फीसदी सब्सिडी के लिए रखा था, पर उनका खर्च 2.5 फीसदी तक चला गया। इस बार के बजट में एक ही सख्त फैसला लिया जा सकता था, वह है कर बढ़ाना। और मुखर्जी ने ऐसा ही किया। राजस्व प्राप्ति का एकमात्र और सबसे बड़ा स्नोत है कॉरपोरेशन। और कोई आश्चर्य नहीं कि बजट बनाने वाले अधिकारी कंपनियों के प्रति आक्रामक रुख अपनाएं। वैसे भी सेवा कर और उत्पाद शुल्क हमारे उत्पादों को नुकसान ही पहुंचाएंगे।
द वॉल स्ट्रीट जर्नल, अमेरिका

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