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राजनीति की रेल

आखिरकार, रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। वह चाहते थे कि रेलवे का भी दूसरे क्षेत्रों की तरह विकास हो, पर तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्षा के दबाव में आकर वह पद से हट गए। हम सब जानते हैं कि पिछले आठ-नौ वर्षो से यात्री किराये में बढ़ोतरी नहीं होने की वजह से रेलवे की माली हालत खराब हो गई थी। इससे उबरने के लिए विकास और आधुनिकीकरण को लक्ष्य बनाकर रेल बजट में रेल मंत्री ने यात्री किराये में 10 फीसदी की बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा था। अगर गौर से देखें, तो उनकी सारी नीतियां दीर्घकालिक फायदे वाली थीं। लेकिन इस प्रस्ताव से उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को अपनी जनाधार खिसकती दिखी। वैसे भी ममता बनर्जी पहले एफडीआई और एनसीटीसी के विरोध में थीं। रेल किराये में इजाफे के प्रस्ताव के साथ ही उन्हें विरोध का एक और मुद्दा मिल गया। और इसके लिए उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेता दिनेश त्रिवदी को बलि का बकरा बन दिया।
वैभव शर्मा ‘वशिष्ठ’, ईस्ट ऑफ कैलाश, नई दिल्ली

किराये से क्या होगा
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रेल बजट में किराया बढ़ाने के प्रस्ताव का जबर्दस्त विरोध किया है। उनकी सख्त नाराजगी के बाद केंद्र सरकार सहम गई है और उम्मीद है कि जल्द ही इस प्रस्ताव को वापस ले लिया जाएगा। ऐसे में, ममता बनर्जी की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। जब ममता बनर्जी रेल मंत्री थीं, तो किराया नहीं बढ़ाया गया। इससे पहले लालू प्रसाद यादव के वक्त में भी यात्री किराये में बढ़ोतरी नहीं की गई थी। तो क्या तब रेलवे पटरी पर नहीं दौड़ रही थी? जरूरत यह है कि रेलवे की प्रबंधन नीतियों में बदलाव किया जाए, न कि किराये में बढ़ोतरी हो।
श्याम सुन्दर, संजय बस्ती, तिमारपुर, दिल्ली

पेंशनरों की समस्या
पिछले दिनों संपादकीय पन्ने के मेल बॉक्स में राजेंद्र अग्रवाल की शिकायती चिट्ठी को पढ़ने का मौका मिला। उनकी शिकायत थी कि छठे वेतन आयोग का एरियर उन्हें नहीं मिला है, जबकि दो किस्तों में इसका भुगतान किया जा चुका है। मैं स्वयं एक वरिष्ठ नागरिक हूं और पिछले कुछ वर्षों से केंद्रीय पेंशन लेखा कार्यालय में पेंशनरों की शिकायतों को दूर करता आ रहा हूं। पेंशनरों की समस्याएं पत्र द्वारा या अन्य माध्यमों से दूर की जाती हैं। समस्याओं को निपटाने के लिए टोल फ्री नंबर की व्यवस्था भी है। पिछले पांच महीनों में पेंशनरों से 15,000 मिनट से अधिक की बातचीत हुई है। प्रतिदिन लगभग 400 टेलीफोन कॉल आते हैं। ऐसे में फोन का व्यस्त रहना स्वाभाविक है। इसके लिए पेंशनर भी संयम बरतें।
एसपी शर्मा, वरिष्ठ सलाहकार, केंद्रीय पेंशन कार्यालय, नई दिल्ली

ईमान और इनाम
पिछले दिनों ‘ईमानदारी की राह में रुकावटें’ शीर्षक आलेख को पढ़ा। इसमें पूर्व प्रशासनिक अधिकारी व लेखक वाईपी सिंह ने जो मुद्दे उठाएं हैं, यकीनन वे प्रशासन-माफिया गठजोड़ को उजागर करते हैं। जाहिर है, इस भ्रष्टाचारी गठबंधन की कीमत बेगुनाह जनता को चुकानी पड़ती है या किसी ईमानदार अधिकारी को। अगर हम प्रशासनिक व्यवस्था पर ध्यान डालें, तो पाते हैं कि अधिकतर ईमानदार अधिकारियों को किसी एक जगह पर टिकने नहीं दिया जाता है। उनकी आधी जिंदगी तो तबादलों की भेंट चढ़ जाती है। इनकी मौत माफियाओं की गोलियों से होती है या फिर झूठे आरोपों की बदनामियों से। जिन अफसरों ने अपनी ईमानदारी को गिरवी रख दिया है, वे मलाईदार पोस्टिंग के मजे लूट रहे हैं।
सुरेंद्र कुमार पाल, दीवान कॉम्पलैक्स, निकट बैंक कॉलोनी, दिल्ली

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