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ध्रुपद समारोह से लौटेगी ध्रुपद गायन की प्रतिष्ठा

करीब तीन दशक के लंबे अंतराल बाद ध्रुपद घरानों के प्रसिद्ध मिथिलांचल क्षेत्र में एक बार फिर से ध्रुपद समारोह के आयोजन से ध्रुपद गायन की प्रतिष्ठा वापस आने की आस बंधी है।

मंदिरों में वैदिक चाओं एवं पदों को गाए जाने वाले ध्रुपद संगीत का संवर्धन और संरक्षण मुगल एवं राजपूत सल्तनतों में काफी हुआ लेकिन लोगों की उदासीनता के कारण यह विधा धीरे धीरे अपनी प्रतिष्ठा खोती चली गई।

करीब तीन दशक बाद ध्रुपद घरानों के क्षेत्र मिथिलांचल में स्पीक मैके द्वारा 20 और 21 मार्च को होने वाले दो दिवसीय ध्रुपद समारोह में क्षेत्र के लोगों में इसकी बेहतरी को लेकर फिर से उम्मीद बंधी है।

अति प्राचीन ध्रुपद वह विधा है, जो ध्वनि एवं संगीत की योग से अवचेतन मन को चैतन्यता प्रदान कर स्नायुतंत्र को जागृति करती है। सही मायने में ध्रुपद ही संगीत का मूल है। हालांकि ध्रुपद नाद योग पर आधारित गायन शैली है लेकिन इसे रूद्र वीणा एवं सुर श्रृंगार जैसे बाद्य यंत्र पर भी बजाया जाता रहा है।

भारत वर्ष में ध्रुपद का मूलतः तीन घराना कायम हुआ जिसमें राजस्थान के उदयपुर एवं अलवर के राजघरानों से संरक्षण पाकर डागरवाणी शैली बिहार में दरभंगा के महाराज लक्ष्मी सिंह के सरंक्षण में अमता घराना का गोबरहार वाणी संवर्धित हुई वहीं पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया के राजघरानों द्वारा बेतिया घराना कायम रहा और काफी पुष्पित एवं पल्लवित हुआ।

स्पिक मैके के दरभंगा चैप्टर के समन्वयक सुनील कुमार मिश्र एवं विश्वविद्यालय के कार्यक्रम संयोजक डॉ. रीता सिंह ने मंगलवार को यहां बताया कि छात्रों को भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं संस्कृति और सभ्यता से अवगत कराने के उद्देश्य से ध्रुपद समारोह का आयोजन किया जा रहा है।

विश्वविद्यालय के दरबार हॉल में ध्रुपद की अलापचारी एवं पखावज की थाप गुंजने की तैयारी अंतिम चरण में हैं।

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