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शक्ति की उपासना का पर्व है नवरात्र

श्रीमद्देवीभागवत में स्पष्ट रूप से कहा गया है, जो व्यक्ति सांसारिक ऐश्वर्य, उत्तम संतान, श्री यश एवं विद्या की कामना करता हो, उसे नवरात्र का उत्तम व्रत करना चाहिए। शक्ति की उपासना करने से व्यक्ति की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। वह शत्रु पर विजय प्राप्त करता है और सर्वत्र पूज्य होता है।

रामायण काल में भगवान श्री राम ने भी नवरात्र के उत्तम व्रत को किया था। इस व्रत के प्रभाव से ही वह रावण जैसे पराक्रमी एवं मायावी शत्रु को परास्त कर पाए थे। देवर्षि नारद ने भगवान श्री राम को इस पावन अनुष्ठान को सम्पन्न करने का उपदेश दिया था। देव, दानव, मनुष्य सभी ने शक्ति की उपासना की है।

साल भर में चार बार नवरात्र आते हैं। साधारणतया लोग चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र के बारे में ही जानते हैं, जिन्हें वासंतिक एवं शारदीय नवरात्र कहा जाता है। शक्ति के उपासक आषाढ़ और माघ मास के नवरात्र में भी पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ शक्ति के अनुष्ठान को सम्पन्न करते हैं।

ऋषियों ने इस काल को यमदृष्टा काल की संज्ञा दी है। ऋतुओं का संक्रमण काल होने के कारण इस समय नाना प्रकार की भयानक बीमारियों के उत्पन्न होने का भय रहता है। आयुर्वेद के मतानुसार इस समय संयमित आहार-विहार करने एवं ब्रह्माचर्य का पालन करने से शरीर को नई ऊर्जा प्राप्त होती है। नवरात्र न केवल आध्यात्मिक बल्कि वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण है। चैत्र प्रतिपदा के दिन ही सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना प्रारम्भ की थी।

किसी भी अनुष्ठान को सम्पन्न करने के लिए पांच प्रकार की शुद्धि अनिवार्य है। देह शुद्धि, भाव शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, क्रिया शुद्धि, स्थान शुद्धि अर्थात अनुष्ठान प्रारम्भ करने से पहले किसी के प्रति कोई दुर्भावना अथवा द्वेष न हो, पूजा की सामग्री स्वच्छ हो, मंत्र-स्तोत्र आदि का पाठ शुद्ध हो। अनुष्ठान स्थल बिल्कुल साफ-सुथरा हो।

पूजा के समय नए वस्त्र धारण करें। प्रात: कालीन संध्या वंदन करने के पश्चात पूजा आरम्भ करें। सर्वप्रथम अनुष्ठान प्रारम्भ करने से पहले पूजा की सामग्री एकत्रित करें। पूजा के समय साधक यानी पूजा करने वाले का मुंह उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। आसन का रंग सफेद या लाल होना चाहिए। आसन कुशा अथवा ऊन का होना चाहिए।

अनुष्ठान में किसी प्रकार की कृपणता न करें। जो लोग समर्थ हैं, वे बारह हाथ, सोलह हाथ अथवा चौबीस हाथ लम्बे व चौड़े यज्ञ मंडप का निर्माण करवाएं, जिसमें मुख्य वेदी के साथ-साथ गणपति, सप्तघृत, मातृका, योगिनी, वास्तु, क्षेत्रपाल, नवग्रह आदि वेदियों का भी निर्माण कराएं। मुख्य एवं नवग्रह वेदी के मध्य रुद्र कलश की स्थापना करें। मुख्य वेदी पर प्रधान कलश एवं भगवती की प्रतिमा अथवा यंत्र की स्थापना करें।

यज्ञ मंडप के अभाव में अपनी श्रद्धा और भक्ति के अनुसार घर में ही एक चौकोर वेदी का निर्माण कर उसके ऊपर भगवती की प्रतिमा अथवा यंत्र को स्थापित करें। भावपूर्ण तरीके से भगवती की पूजा करें। प्रतिदिन भगवती दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों का ध्यान करते हुए अपनी श्रद्धा एवं सामथ्र्य के अनुसार पंचोपचार, षोड्शोपचार अथवा राजोपचार द्वारा भगवती का पूजन करें। प्रतिदिन सुबह-शाम भगवती का पूजन करें। नाना प्रकार के व्यजनों का भोग लगाएं। सामर्थ्य के अनुसार ऋतु फल अर्पित करें। यदि आपने गुरु मंत्र लिया हुआ है तो  सर्वप्रथम गुरु का ध्यान करते हुए गुरु पादुका मंत्र का जप करें। उसके बाद गुरु मंत्र का जप करें। जप सम्पूर्ण होने के बाद भगवती के स्तोत्र का पाठ करें।
अंत में क्षमा अपराध स्तोत्र का पाठ करें। अष्टमी व नवमी के दिन भगवती की कुल परम्परा के अनुसार पूजा करें। कन्या पूजन शक्ति पूजा का आवश्यक
अंग है।

कन्या को साक्षात् आद्याशक्ति भगवती का स्वरूप मानते हुए पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा के लिए दो वर्ष से दस वर्ष की कन्या का वरण किया जाता है। कन्या पूजन में भेदभाव नहीं करना चाहिए।

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