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सर्व मंगलकारी है सौभाग्य सुंदरी व्रत

चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाने वाला सौभाग्य सुंदरी व्रत स्त्रियों के लिए सर्व मंगलकारी माना गया है। इसी दिन माता सती ने अपनी घोर तपस्या के फलस्वरूप भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। पिता के घर अपने पति शिव के बारे में कहे गए अपमानजनक शब्दों से आहत होकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद पुन: मां सती ने पर्वतराज हिमालय के घर कन्या रूप में जन्म लिया था, इसलिए ब्रह्मा जी ने इनका नाम पार्वती रखा।

पार्वती ने पुन: शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर शिवाराधना आरम्भ कर दी। अनेक प्रकार से कठिन परीक्षा लेने के बाद भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया और इस प्रकार चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया को शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। इसलिए इस दिन महिलाएं मनोनुकूल पति और पुत्र प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं।

सौभाग्य की इच्छा रखने वाली महिलाएं इस दिन तिल मिश्रित जल से शिव-पार्वती को स्नान करा कर यथोचित वस्त्र-स्वर्णाभूषण आदि से पूजा करते हुए इस मंत्र का जप करें- गौरी में प्रीयतां नित्यमघनाशाय मंगला! सौभाग्यायास्तु ललिता भवानी सर्व सिद्धये!! गौरी नित्य मुझ पर प्रसन्न रहें। मंगला मेरे पापों का विनाश करें। ललिता मुझे सौभाग्य प्रदान करें और भवानी मुझे सर्वसिद्धियां प्रदान करें। पूजन सामग्री में श्रृंगार का सामान, लाल वस्त्र, गंगा जल, हल्दी, अक्षत, कुमकुम, सिन्दूर, रोली, मोली, पुष्प, फल, फूल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, नारियल आदि जो भी यथासंभव उपलब्ध हों, उसी से शिव-पार्वती का पूजन करें। सामग्री को अर्पण करते समय यह मंत्र भी पढ़ें-
विश्वकायौ विश्वमुखौ विश्वपादकरौ शिवौ! प्रसन्न वदनौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ!!
अर्थात्— विश्व जिनका शरीर है, जो विश्व के मुख, पाद और हस्त स्वरूप तथा मंगल कारक हैं, जिनके मुख पर सर्वथा प्रसन्नता झलकती रहती है, उन पार्वती और परमेश्वर की मैं वंदना करती हूं। इस सौभाग्य सुंदरी व्रत के विषय में अनेक कथाएं हैं, किन्तु भगवान विष्णु द्वारा बताया गया एक वृत्तांत परम् सत्य और प्रामाणिक है। वह इस प्रकार है।
भगवती पार्वती की जया और विजया नाम की दो सखियां थीं। एक समय मुनि कन्याओं ने उनसे पूछा कि आप दोनों भगवती पार्वती के साथ सदा निवास करती हैं। वे किस दिन, किन उपचारों तथा मन्त्रों से पूजा करने से प्रसन्न होती हैं। इस पर जया बोलीं कि मैं सब कामनाओं को सिद्ध करने वाले व्रत का वर्णन करती हूं। चैत्रमास शुक्ल पक्ष की तृतीया को प्रात:कालीन दिनचर्या से निवृत्त होकर स्त्रियां अपने सौभाग्य वस्त्रभूषणों को धारण करें। पूजा-स्थल को सुंदर वेदी और पुष्पों से सुसज्जित करें। सर्वप्रथम अपने पितरों की पूजा करें, फिर पूजा स्थल में जाएं। दीप प्रज्जवलन और गणेश, वरुण, नवग्रह आदि सबको प्रणाम करते हुए पार्वती, ललिता, गौरी, गांधारी, शांकरी, शिवा, उमा, सती इन आठ नामों से पूजा करें, फिर हल्दी, कुमकुम, कपूर, चन्दन आदि का लेपन करें। उपलब्ध सामग्री को अर्पण करते हुए ‘गौरी में प्रीयतां’ बोलती रहें। इस पूजा में अधिकाधिक ऋतु फल का ही प्रयोग करें।

माता पार्वती के सम्मुख रात्रि जागरण करें। सुबह होने पर पुन: पूजन करके सुहागिन स्त्रियों और ब्राह्मणों को भोजन करवाएं। ऐसा करने से माता पार्वती की असीम कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सब कष्ट समाप्त हो जाते हैं। यह व्रत अविवाहित कन्याओं को मनोकूल पति और विवाहिता को सौभाग्य प्रदान करता है।

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