DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सृष्टि के पुनर्निर्माण का दिन

भगवान विष्णु के दस अवतारों में मत्स्यावतार सतयुग में हुआ था। चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया को भगवान मत्स्यावतार का जन्मदिन माना गया है। इस दिन मत्स्यावतार की कथा कह कर व्रत रखा जाता है। चावलों का भोग लगाकर बांटा तथा ग्रहण किया जाता है।

मत्स्यावतार से संबंधित कथा इस प्रकार है। सूर्य पुत्र मनु राजपाठ पुत्र को सौंप कर वन में जाकर योग साधना व तप करने लगे। सौ वर्ष बीतने पर ब्रह्मा ने उनके तप से प्रसन्न होकर उनसे वर मांगने को कहा। मनु ने प्रलय के समय चराचर की रक्षा करने का वर मांगा। वह बड़े दयालु और भगवान के परम भक्त थे। एक दिन नदी में तर्पण करते समय उनकी अंजुरी में छोटी-सी मछली आ गई। मछली ने रक्षा की प्रार्थना की। मछली की प्रार्थना पर राजा उसे अपने कमण्डल में डालकर ले आए। रात ही रात में मछली इतनी बड़ी हो गई कि उसे कमण्डल से निकाल कर मटके में रखना पड़ा। पर उसका आकार पुन: इतना बढ़ गया कि उसे मटके से निकाल कर कुएं में रखना पड़ा। जब वह मछली कुएं में भी नहीं समाई, तब उसे तालाब में रखा। पर जब तालाब भी छोटा पड़ने लगा, तब मनु ने उसे गंगा में रखा। जब वह मछली गंगा में भी नहीं समाई तो मनु ने उसे समुद्र में डाल दिया। वह मत्स्य समुद्र में भी नहीं समाया तो मनु समझ गए कि यह साधारण मछली नहीं है, साक्षात् नारायण हैं।

यह ज्ञात होने पर उन्होंने भगवान नारायण की स्तुति आरंभ कर दी। इस पर प्रसन्न होकर भगवान नारायण प्रकट हुए और उनसे कहा कि तुमने बहुत उचित वर मांगा है। बहुत शीघ्र प्रलय आएगी और धरती, वन, पर्वत सभी कुछ डूब जाएंगे। इन सबकी रक्षा के लिए तुम एक बड़ी नौका बनवाओ और उसमें सब जीवों तथा बीजों के जोड़ों को संभाल कर रखो। तुमने ब्रह्माजी से विश्व की रक्षा का वर प्राप्त किया है, अत: प्रलयकाल में तुम सबकी रक्षा करना तथा जब तूफान बढ़ जाए तो इस नौका को मेरे सींग से बांध देना। 

इस प्रकार तुम सब प्राणियों की रक्षा करने में समर्थ होगे व तुम्हारी कीर्ति चारों दिशाओं में फैलेगी। विष्णु की बात सुनकर मनु ने प्रलय का समय पूछा, तब मत्स्य नारायण ने कहा, ‘‘जब पृथ्वी पर वर्षा नहीं होगी, दुर्भिक्ष होगा, सूर्य का ताप बढ़ेगा, भगवान शंकर के तीसरे नेत्र से आग निकलेगी, जिसकी गर्मी से भाप बनेगी व मेघ वर्षा होगी। चारों तरफ जल ही जल होगा। उस वक्त मैं, तुम, सूर्य, चन्द्र, ऋषि मार्कण्डेय, नर्मदा नदी, चारों वेद और पुराण ही बचेंगे। फिर मैं नई सृष्टि की रचना करूंगा। वेदों का प्रवर्तन करूंगा।’’ जब प्रलय का समय आया, तब विष्णु मत्स्य रूप में अवतरित हुए। मत्स्यावतार में नीचे का हिस्सा रोहू मछली जैसा व ऊपर का हिस्सा मनुष्य का होने के कारण इसे मत्स्यावतार कहा जाता है। इनके सिर पर सींग, चार हाथ व संपूर्ण शरीर पर कमल के चिह्न् थे। मनु ने सभी प्राणियों को नाव पर बैठा दिया व नाव को मत्स्य के सींगों से बांध दिया। इसके बाद मत्स्यरूपधारी भगवान ने मनु को ज्ञान, मुक्ति व तत्त्व का उपदेश दिया।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सृष्टि के पुनर्निर्माण का दिन