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रक्षा तैयारियों की एशियाई होड़

चीन द्वारा अपने रक्षा बजट में 11 फीसदी की बढ़ोतरी की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद भारत ने पिछले सप्ताह यह एलान किया कि वह अगले वित्त वर्ष के लिए अपने रक्षा व्यय में 17 प्रतिशत की वृद्धि करेगा। आधुनिक इतिहास में पहली बार एशिया रक्षा खर्च के मामले में यूरोप को पीछे छोड़ने जा रहा है, क्योंकि यूरोपीय मुल्क जहां अपने रक्षा खर्चों में कटौती कर रहे हैं, वहीं चीन और भारत का इस मद में व्यय लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

साल 2008 के आर्थिक संकट के बाद से यूरोप और एशिया के रक्षा खर्च के स्तरों में एक खास प्रवृत्ति देखने को मिली है। हालांकि यूरोप के देशों के मुकाबले एशियाई देशों में प्रति व्यक्ति खर्च अब भी बहुत कम है, फिर भी एशिया के रक्षा खर्च के मौजूदा रुझानों को देखें, तो लगता है कि साल 2012 में इस मामले में यूरोप के आंकड़े से भी एशिया आगे निकल जाएगा। यूरोप के देश वैश्विक आर्थिक संकट के मद्देनजर अपने रक्षा खर्च में कटौती कर रहे हैं। नाटो में शामिल यूरोप के करीब 16 देशों ने साल 2008 से 2010 के बीच रक्षा क्षेत्र के लिए बजटीय आबंटन कम किए हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को छोड़ दें, तो एशियाई देशों ने वर्ष 2011 में रक्षा क्षेत्र के ऊपर 262 खरब डॉलर खर्च किए, जबकि इसके मुकाबले नाटो के यूरोपीय सदस्य देशों का खर्च 270 खरब डॉलर रहा। साल 2012 में रक्षा खर्च के ये आंकड़े उलट जाएंगे।

एशियाई देश रक्षा क्षेत्र पर जितना खर्च करते हैं, उनका 30 फीसदी तो अकेले चीन व्यय कर रहा है। साल 2015 तक तो चीन का रक्षा बजट इतना विशाल हो जाएगा कि अमेरिका को छोड़ नाटो के शीर्ष आठ देशों, यानी ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, टर्की, कनाडा, स्पेन और पोलैंड के कुल रक्षा खर्च से भी अधिक धन वह अपनी सेना को चुस्त-दुरुस्त बनाने पर व्यय करेगा।

रक्षा क्षेत्र में चीन का विशाल निवेश ही वह मुख्य वजह है कि दुनिया में रक्षा मद में सर्वाधिक खर्च करने वाले देश अमेरिका ने इस साल अपनी सैन्य रणनीति में तब्दीली की है और पेंटागन ने अपनी प्राथमिकता सूची में एशिया को ऊपर कर दिया है, जबकि यूरोप में फौजों की संख्या में काफी तेजी से कटौती की जा रही है। अमेरिकी रक्षा मंत्री लियोन पनेट्टा ने साफ किया है कि एशिया में फौजी गतिविधियां बढाई जाएंगी, हालांकि अगले दशक के लिए पेंटागन के बजट में तकरीबन 485 खरब डॉलर की कमी की गई है।

चीन ने पिछले दशक में अनेक बड़े व अत्याधुनिक हथियार-प्रणाली विकसित करने तथा उनकी खरीद पर जबर्दस्त निवेश किया है। उसने जमीनी स्तर पर मार करने वाली एंटी-शिप मिसाइल प्रणाली विकसित की है, जो अमेरिकी क्षमताओं को अंकुश लगाने में सक्षम है। इसने हैनान द्वीप में नया पनडुब्बी अड्डा तैयार किया है। यह अड्डा साउथ चाईना सी के किनारे तैयार किया गया है। इनके साथ ही चीन ऐसा फाइटर विमान तैयार कर रहा है, जो रेडार की पकड़ में न आए। उसने हाल ही में पुराने यूक्रेनियाई विमानवाहक जहाज को फिर से तैयार किया है।

यूरोपीय रक्षा खर्च में गिरावट की तस्वीर साफ दिखती है। पिछले साल के लीबिया अभियान ने यूरोपीय देशों की टैंकर एयरक्राफ्ट, खुफिया, निगरानी और टोही क्षमताओं की कमियों को उजागर किया था। यूरोपीय देशों में जन-कल्याणकारी क्षेत्रों में कायम दबाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि रक्षा खर्च में कटौती की यह प्रवृत्ति बहुत जल्दी पलटने वाली नहीं है। एक ऐसे वक्त में, जब वाशिंगटन अपना ध्यान यूरोप से हटाकर एशिया पर केंद्रित कर रहा है, अमेरिकी व नाटो प्रमुखों को यूरोपीय रक्षा बजट में कमी ने चिंतित कर दिया है। पर इसमें संदेह ही है कि यूरोपीय देश सुरक्षा मोर्चे पर कोई बाहरी अप्रत्याशित चोट पहुंचने तक इस कटौती पर कोई गौर करेंगे।

द्वितीय विश्व युद्ध ने हमें बताया है कि दरअसल समुद्री क्षेत्र में एशिया-प्रशांत काफी महत्वपूर्ण है। अब मलक्का का जलडमरूमध्य जैसा व्यस्ततम समुद्री गलियारा भी इसका हिस्सा है। दुनिया के ऐसे देशों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो इस समुद्री मार्ग से ईंधन व कच्चे माल के आयात के लिए आश्रित हैं और समुद्री जहाजों से माल ढुलाई के जरिये विश्व अर्थव्यस्था में जिनकी हिस्सेदारी है। ये शिपिंग मार्ग काफी महत्व रखते हैं। प्रशांत महासागर सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि चीन व अमेरिका द्वारा इसमें अपना दबदबा कायम करने की प्रतिस्पर्धा छिड़ी है। इसके आर्थिक-सामरिक महत्व के कारण ही शांतिप्रिय संविधान वाले जापान ने इस क्षेत्र में दुनिया की अपनी सबसे आधुनिकतम व सक्षम फौज तैनात कर रखी है। बल्कि शायद वियतनाम, सिंगापुर, इंडोनेशिया व मलयेशिया जैसे साउथ चाईना सी के तटीय देशों की स्थिति अधिक दिलचस्प है। इनमें से प्रत्येक देश सैन्य रूप से खुद को मजबूत करने में जुट गया है। वे न सिर्फ अपनी थलसेना की तादाद बढ़ा रहे हैं, बल्कि नौसेना के आधुनिकीकरण में भी जबर्दस्त निवेश कर रहे हैं।

‘आर्म्स रेस’ के जुमले का इस्तेमाल अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ के शीत युद्ध के दौरान शुरू हुआ था। लेकिन उस समय के दो-ध्रुवों के बीच के ध्रुवीकरण के उलट एशिया-प्रशांत में कई तरह के ध्रुवीकरण दिख रहे हैं, भले ही इसके केंद्र में अमेरिकी और चीनी सक्रियता दिखाई देती हो। बहरहाल, यह बढ़ती बहुध्रुवीयता और इस क्षेत्र में बढ़ता निवेश नौसेना व वायुसेना को दक्ष बनाने की होड़ के साथ जुड़ गए हैं। लेकिन इसका मतलब यही नहीं है कि एक ऐसे माहौल में, जहां चारों तरफ रक्षा खर्चों में बढ़ोतरी हो रही है, उसमें ऐसा करते रहना चाहिए। एशिया प्रशांत के इलाके में सभी क्षेत्रों में निवेश की जरूरत है और निवेश की यह मांग सभी देशों में लगातार बढ़ रही है। इसलिए तेजी से बदलते रणनीतिक परिदृश्य में भारत को अपनी रक्षा नीति को नया रूप देना ही पड़ेगा। वास्तव में, यदि नई दिल्ली में बैठे रणनीतिकार अपनी घरेलू समस्याओं में ही फंसे रहे और आस-पास के यथार्थ से उन्होंने खुद को काटे रखा, तो यह घातक होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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