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एक चैंपियन के चूक जाने की कहानी

यह खबर आई और सन्नाटे के साथ गुजर गई कि राज्यवर्धन सिंह राठौर 2012 लंदन ओलंपिक्स में भारतीय निशानेबाजी टीम का हिस्सा नहीं होंगे। राज्यवर्धन सिंह राठौर ही वह निशानेबाज हैं, जिन्होंने देश को सपना देखना सिखाया कि ओलंपिक में गोल्ड मेडल भी जीता जा सकता है। 2003 में विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक फिर ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर राठौर ने शूटिंग को उस मुकाम तक पहुंचा दिया, जहां हर कोई पूरे विश्वास से यह कहता है कि ओलंपिक का मेडल आएगा, तो शूटिंग से।

जब बीजिंग ओलंपिक में अभिनव बिंद्रा ने गोल्ड मेडल पर निशाना साधा, चाहे-अनचाहे हमने राज्यवर्धन सिंह राठौर के ‘अचीवमेंट’ को कम आंकना शुरू कर दिया। लोग यह बात भूल गए कि अभिनव बिंद्रा और राज्यवर्धन सिंह राठौर में बहुत बड़ा फर्क था। 2008 में गोल्ड मेडल जीतने वाले बिंद्रा उससे पहले के एक दशक से मेडल के दावेदारों में गिने जाते थे। उनसे उलट राज्यवर्धन सिंह राठौर को कम ही लोग जानते थे।

बहरहाल, लंदन ओलंपिक के लिए उनका चयन न होने के पीछे की वजहों को समझना होगा। पहली कारण तो बना राज्यवर्धन सिंह राठौर का प्रदर्शन। राठौर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करते रहे, लेकिन जिन प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन के आधार पर ओलंपिक टीम में जगह मिलती है, वहां वह चूक गए। मसलन, जब नेशनल चैंपियनशिप में उन्हें 140 का स्कोर टीम में जगह दिला सकता था, तब आखिरी ट्रायल्स में उन्होंने सिर्फ 128 का स्कोर हासिल किया। जाहिर है, तमाम दूसरी प्रतिस्पर्धाओं में किए गए उनके अच्छे प्रदर्शनों पर पानी फिर गया। वरना बीते साल चिली ने 16 में से आठ इवेंट में जितना स्कोर बनाया, उतने स्कोर पर तो पिछले ओलंपिक में छह बार कांस्य मेडल मिला था और दो बार गोल्ड मेडल। दूसरी वजह बनी ओलंपिक में डबल ट्रैप शूटिंग इवेंट की सरंचना। ओलंपिक के डबल ट्रैप इवेंट में कुल 16 कोटे की जगह होती हैं। इन 16 कोटे से 18 निशानेबाज हिस्सा ले सकते हैं। राठौर की बदकिस्मती यह रही कि कोटे के 16 निशानेबाजों के बाद जिन दो की जगह बचती थी, वहां दूसरे निशानेबाजों का कब्जा हो गया। थोड़ा-बहुत रोल उनकी बगावत ने भी निभाया। स्पोर्ट्स बिल की वकालत करते समय उन्होंने तमाम खेल संगठनों को ही खेल का सबसे बड़ा दुश्मन बताया था।

अब राठौर क्या करेंगे? अगला ओलंपिक चार साल बाद आएगा। क्या तब तक राठौर खुद को ‘मोटीवेट’ कर पाएंगे? उनके सामने दो रास्ते हैं या तो वह बंदूक उठाकर शूटिंग रेंज जाएंगे या फिर बंदूक नहीं उठाएंगे और उन सोए हुए अधिकारियों को जगाने की कोशिश करेंगे, जो भारतीय खेलों के लिए ‘नासूर’ बनते जा रहे हैं। राठौर आराम से बैठने वालों में नहीं हैं- जिंदगी के उतार-चढ़ाव को पड़ाव बनाना उन्हें आता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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