DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बीस दिन की मास्टरी, फिर अंधेरी रात

शासक तो एक दिन का भी हो सकता है, बल्कि होते आए हैं। कहते हैं कि प्राचीन काल में भी दानी किस्म के शासक अपनी उदारता का प्रदर्शन करते हुए मांगने वाले को एकाध दिन का राज यूं ही सौंप देते थे। लेकिन यह सिलसिला उस जमाने से तो अवश्य ही चला आ रहा है, जब एक दिन के शासक बने भिश्ती ने चमड़े के सिक्के चला दिए थे। आज जनतंत्र के जमाने में भी फिल्मों में ही नहीं, असल में भी एक दिन के शासक मिल जाते हैं। छह साल तक शासन करने से पहले अटलजी ही एक बार तेरह दिन के शासक साबित हुए थे। आज बिहार में स्थायित्व की कुरसी पर बैठे नीतीशजी तो पहली बार काफी कम वक्त के शासक साबित हुए थे। तो शासक एक दिन का भी हो सकता है, बल्कि होते आए हैं।
लेकिन गुरु का रिश्ता इतना अल्पकालिक नहीं होता। इसमें बड़ा स्थायित्व रहता है। यह रिश्ता जन्म-जन्मांतर का चाहे न होता हो, पर जन्म भर का तो अवश्य होता है। अब यह रिश्ता भी बड़ा ही अल्पकालिक साबित हो रहा है। खबर आई है कि बिहार में तीस साल के इंतजार के बाद बहाल हुए मास्टर, कोई बीस दिन की मास्टरी कर पाए और रिटायर हो गए। यानी उम्र भर प्रेमिका का इंतजार करने वाले प्रेमी ही नहीं होते, नौकरी का इंतजार करने वाले मास्टर भी होते हैं। जैसे उम्र भर अपराधी होने का कलंक झेलने वाले को अगर आखिर में न्याय मिल जाए, तो नाटक सुखांत हो जाता है। पर वैसा, उम्र भर के इंतजार के बाद नौकरी पाने वाले इन मास्टरों के साथ नहीं हुआ। बेरोजगारी का ठप्पा अभी धुंधला भी नहीं पड़ा था कि फिर से बेरोजगारी का ठप्पा लग गया। वे शिष्यों को ठीक से आशीर्वाद देना सीख भी नहीं पाए थे कि पता चला दिल भी खाली और हाथ भी खाली। आशीर्वाद कहां से दें?

वे रिटायर तो हो गए, पर वैसे रिटायर नहीं हुए कि रिटायर होने का सुख ले पाएं। उन्हें पेंशन नहीं मिलेगी, क्योंकि इसके लिए एक अवधि तक नौकरी करना जरूरी है। इनका तो कोई रिकॉर्ड भी नहीं मिलेगा। एक दिन के शासक का रिकॉर्ड तो फिर भी मिल जाता है, पर बीस दिन के मास्टर का तो नहीं ही मिलता है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बीस दिन की मास्टरी, फिर अंधेरी रात