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मन की स्वच्छता

मन पर ध्यान दें। क्या होता है? मन धुलकर फिर से साफ हो जाता है। मन के विरोधाभास स्वरूप को गले लगाने और स्वयं में अस्तित्व की समझ को विकसित करने के लिए यह आवश्यक है कि मन को नहलाएं।

आप जब बाहर जाते हैं, तो अच्छे कपड़े पहनते हैं। हो सकता है कि कपड़े नए हों या इस्तरी किए हुए हों। दोनों अवस्था में आप इसे पहनकर बाहर जाते हैं। फिर क्या होता है, कपड़े मैले हो जाते हैं और आपको इन्हें धोना पड़ता है। इसी तरह, आप नहाकर पूरे शरीर में इत्र लगाते हैं। कितनी देर तक इत्र की खुशबू रहेगी? वह कुछ समय के लिए ही रहेगी। फिर आपको दूसरे दिन नहाना पड़ता है। यदि आप दो-तीन दिन नहीं नहाते हैं, तो तीसरे दिन आपके पास कोई नहीं आएगा। आपको स्वच्छ रहने के लिए फिर स्नान करना पड़ता है। हमारा मन भी इसी के समान है। जब आप अपने शरीर को स्नान कराते हैं, तो आपको दूसरे दिन फिर से स्नान करना पड़ता है। कभी आपको उसी दिन संध्या में भी स्नान करना पड़ता है। यदि ठंड हो, तो दूसरे दिन स्नान करना पर्याप्त है।

कोई नहीं कहता कि वह तभी स्नान करेगा, जब उसका शरीर मैला होगा। कोई भी इस बात पर कि स्नान करे या न करे के लिए बार-बार अपनी नाक नहीं चढ़ाता है। हम शरीर सूंघें या नहीं, शरीर मैला हो या स्वच्छ, हम हर रोज स्नान करते ही हैं। यदि आपके हाथों में गहरा रंग या कोयला लगा हो, तो इस रंग को निकलने में कम से कम कुछ दिन लग जाते हैं। फिर भी आप सारे प्रयास शुरू रखते हैं और अपने मन के शांत स्वरूप को नहीं बिगाड़ते। इसी तरह, हमें अपने मन की अशुद्धियों को भी निरंतर साफ करते रहना होता है। आप प्रतिदिन बैठकर कुछ समय ध्यान लगाएं। प्राणायाम, भजन और प्रार्थना करें। अपने मन पर ध्यान दें। देखें, क्या हो रहा है? मन वाकई धुल जाता है और फिर से स्वच्छ हो जाता है।

 

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