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लाल झंडा और नीला फीता

हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जब मार्क्सवादी खेमे में निराशा देखने को मिल रही है और ऐसे दौर से आनंद पटवर्धन भी अछूते रहेंगे, इसकी उम्मीद तो थी, परजय भीम कॉमरेड  के नाम से यह उम्मीद भी डगमगाने लगी थी। फिल्म एक तरह से क्रांतिकारी दलित गायक विलास घोगरे को रचनात्मक श्रद्धांजलि है। विलास घोगरे को पहली बार आनंद की फिल्म बॉम्बे: हमारा शहर  में एक कथा सुनो रे लोगों..एक व्यथा सुनो रे लोगों..हम मजदूर की करुण कहानी, आओ करीब से जानो! गाते हुए देखा—सुना था। आनंद की यह शायद पहली फिल्म है, जिसमें वह राजनीति के अलावा सांस्कृतिक व सामाजिक कथाओं को भी लेकर आए हैं। विलास के उपर्युक्त गीत में सामाजिक—सांस्कृतिक पहलू को देखने का एक प्रबल आग्रह है। जय भीम कॉमरेड अपने तईं इसी प्रबल आग्रह की पूर्ति करती है। 16 जनवरी, 1997 को ट्रेड यूनियन नेता दत्ता सामंत की हत्या होती है। एक जुलाई 1997 को मुंबई की रमाबाई कॉलोनी में अंबेडकर की प्रतिमा के अपमान का विरोध दर्ज करा रहे दलितों का पुलिसिया दमन होता है। दसियों प्रदर्शनकारी मारे जाते हैं। इसके बाद विलास घोगरे आत्महत्या करते हुए एक तरह का प्रतिकार दर्ज करते हैं। इसी ‘विडंबना’ ने आनंद को इस फिल्म के लिए उकसाया। जो कवि मार्क्सवाद का अनुयायी बनकर जीवन का करुण गीत गाता रहा, अंत में खुद भी एक करुण कहानी बन गया। इस विडंबना का खास पहलू यह है कि खुदकुशी करते समय विलास ने सिर पर लाल झंडा नहीं, नीला रिबन लपेट लिया था।
बरगद में उदय शंकर

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  • Web Title:लाल झंडा और नीला फीता