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सवालों के बीच इस्तीफा

दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे से पिछले पांच दिनों तक चल रहे नाटक का पटाक्षेप नहीं हुआ है, बल्कि यह उस नाटक का एक और दृश्य है, जिसमें आगे और विवाद व जटिलताएं होंगी, क्योंकि इस विवाद ने जो सवाल खड़े किए हैं, वे अभी तक अनुत्तरित हैं। पहला सवाल तो यही है कि रेल बजट का क्या होगा, खासकर बजट में रेल किराया बढ़ाने के प्रस्ताव का? प्रधानमंत्री खुले तौर पर दिनेश त्रिवेदी और उनके बजट के प्रति अपना समर्थन जता चुके हैं। जाहिर है, तृणमूल कांग्रेस के सांसद रेल बजट पर बहस में भी बजट का विरोध ही करेंगे, ऐसे में सरकार के लिए इसे पास करवाना मुश्किल हो जाएगा। अगर राजनीतिक वजहों से बजट में वे सारे परिवर्तन हो गए, जो तृणमूल कांग्रेस चाहती है, तो फिर रेलवे का क्या होगा? यह साफ है कि रेलवे की माली हालत बहुत अच्छी नहीं है, और अगर अगला रेल मंत्री भी तृणमूल कांग्रेस से ही हुआ, तो सरकार पर आर्थिक भार बढ़ता ही जाएगा। रेलवे यूनियनों ने धमकी दी है कि या तो सरकार किराये में बढ़ोतरी को बनाए रखे या फिर उतना ही पैसा रेल विभाग को दे, वरना वे आंदोलन की राह पकड़ सकते हैं। यह सवाल भी अब तक अनुत्तरित है कि क्या ममता बनर्जी को किराये में बढ़ोतरी के बारे में पहले सचमुच पता नहीं था या उन्हें पता था और फिर भी उन्होंने केंद्र सरकार को ऐसा झटका देने के लिए रेल बजट पेश होने तक चुप्पी साध ली? दिनेश त्रिवेदी ने चुपचाप इस्तीफा देकर अपनी गरिमा बनाए रखी, लेकिन कुछ जमा यह नाटक भारतीय लोकतंत्र के अशोभनीय अध्यायों में ही गिना जाएगा, जहां रेल मंत्री के बजट पेश करते ही उसकी पार्टी ने उसे तुरंत हटाने की मांग कर दी। कहा यह जाता था कि केंद्र सरकार त्रिवेदी को संसद के इस सत्र के खत्म होने तक रेल मंत्री बनाए रखना चाहती थी, लेकिन उन्होंने इस्तीफा देकर मामले को आसान बना दिया या और उलझा दिया, यह ठीक-ठीक समझना मुश्किल है।

लंबे वक्त से रेलवे राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण विभाग बन गया है। रेल मंत्री का पद आमतौर पर गठबंधन के सबसे ताकतवर सहयोगी पार्टी को मिलता है और रेल मंत्री इस पद का खुला उपयोग अपनी राजनीति के लिए करता है। रेलवे न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, बल्कि उसमें बड़े पैमाने पर रोजगार देने की गुंजाइश है। रेलवे के पास देश में अकूत जमीन और संपत्तियां हैं। इन सभी चीजों का इस्तेमाल अपने समर्थकों को लाभ पहुंचाने और अपना राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए किया जाता है। इस सारी राजनीतिक कवायद से रेलवे के अपने हित प्रभावित होते हैं, इसीलिए भारतीय रेलवे वक्त से बहुत पीछे रह गई है। भारतीय रेलवे की तमाम सेवाएं लड़खड़ा रही हैं, उसका सुरक्षा रिकॉर्ड लगातार खराब हो रहा है। रेलवे की आय बढ़ाने और उसके आधुनिकीकरण की कोशिशों में रेल मंत्री की दिलचस्पी नहीं होती, लेकिन उसी लड़खड़ाते ढांचे पर और बोझ लदता चला जाता है। दिनेश त्रिवेदी के रेल बजट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसमें इन समस्याओं पर ध्यान दिया गया था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसमें सुरक्षा पर जोर दिया गया था। लंबे वक्त बाद एक रेल मंत्री ने रेल दुर्घटनाओं में लोगों के मारे जाने को अपने बजट का केंद्रीय मुद्दा बनाया। आखिरकार कब तक भारतीय रेलगाड़ियां पुराने किस्म के डिब्बों में अमानवीय ढंग से ठूंसे हुए लोगों को खतरनाक ढंग और धीमी गति से ढोती रहेंगी? तो क्या रेलवे के आधुनिकीकरण की कोई भी कोशिश राजनीतिक वजहों से कामयाब नहीं हो पाएगी? दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे के बाद ये सवाल और मौजूं हो उठते हैं और इनके जवाबों से अब ज्यादा देर तक कतराया नहीं जा सकता।

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