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रक्षा बजट से बढ़ी चिंता

हिन्दुस्तान के पड़ोसियों की चिंताएं बढ़ जानी चाहिए, क्योंकि इस मुल्क ने अपने रक्षा बजट में एक और इजाफा किया है। अब इसे बढ़ाकर 38.6 बिलियन डॉलर कर दिया गया है, जो बहुत बड़ी राशि है। बीते शुक्रवार को संसद में बजट पेश करते हुए हिन्दुस्तान के खजाना मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा, ‘यह आबंटन मौजूदा जरूरतों के हिसाब से किया गया है।’ हिन्दुस्तान के रक्षा बजट में 17 फीसदी का इजाफा किया गया है। इसके पीछे वहां के हुक्मरानों की मंशा है कि परमाणु तकनीकी तथा फौजी व्यवस्था को और मजबूती दी जाए, जबकि यह मुल्क दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकतों में से एक पहले ही है। बजट में पूंजीगत खर्चे के लिए 17.5 बिलियन डॉलर आबंटित किए गए हैं। यानी इस रकम का इस्तेमाल फौज के सभी अंगों को आधुनिक बनाने में किया जाएगा। वैसे, हिन्दुस्तान के पास पहले से ही ‘न्यूक्लियर ट्रायड’ है। वह 51-मिराज के 2000 फाइटर जेटों को अपग्रेड कर रहा है। 126 राफेल मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट की खरीद के लिए फ्रांस के साथ 20 बिलियन डॉलर की सौदेबाजी हो चुकी है। 145 अल्ट्रा-लाइट तोपों के लिए अमेरिका से हिन्दुस्तानी हुकूमत की बातचीत चल रही है। यहां तक कि अमेरिका को 49 जंगी जहाजों का ऑर्डर भी दिया जा चुका है। हथियारों के जखीरे में जबर्दस्त इजाफे का कारण यह नहीं है कि हिन्दुस्तान अपनी हिफाजत को लेकर फिक्रमंद है, बल्कि इसके पीछे उसकी बढ़ती महत्वाकांक्षाएं हैं। भारत की आर्थिक तरक्की का हवाला देने वाले उसके कर्ताधर्ताओं को अवाम की जरूरतों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। वे यह न भूलें कि मिडिल क्लास की तेज तरक्की के बावजूद हिन्दुस्तान में तंगहाली है। अनपढ़ लोगों की तादाद ज्यादा है। बावजूद इनके कश्मीर में फौजी टुकड़ियां फंसी हुई हैं, क्योंकि नई दिल्ली इस समस्या के अमनपसंद निपटारे की पहल नहीं कर रहा। ऐसे में, फौज को ज्यादा रकम देकर हिन्दुस्तान ने अपने पड़ोसी मुल्कों को गलत पैगाम दिया है। इससे तो दक्षिण एशिया में तनाव ही बढ़ेगा। पड़ोसियों की चिंताएं बेबुनियाद नहीं हैं, क्योंकि हिन्दुस्तान से इनके रिश्ते बेहतर नहीं हैं और इनके बीच जंग का इतिहास भी है।
द डॉन, पाकिस्तान

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