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सुरक्षा को प्राथमिकता

बजट सत्र में सरकार ने साफ कर दिया है कि एनसीटीसी पर आम सहमति बनाने की कोशिश होगी। साफ है, सरकार आतंकी हमलों को रोकने के प्रति प्रतिबद्ध है। बस उसे विपक्ष का भरोसा जीतना है। इस मसले पर केंद्र और राज्यों के बीच विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। कई राज्यों के मुख्यमंत्री एनसीटीसी के विरोध में हैं। इन्हें लगता है कि पुलिस-प्रशासन राज्य का विषय है, तो केंद्र क्यों अड़ंगा डाल रहा है? परंतु मुख्यमंत्रियों को यह भी सोचना चाहिए कि आतंकवाद सिर्फ केंद्र सरकार का सिरदर्द नहीं है। इसके लिए सभी राज्यों को एक साथ पहल करनी होगी। केंद्र को भी यह विचार करना चाहिए कि कहीं भावी संस्था भी दूसरी सुरक्षा एजेंसियों की तरह निष्प्रभावी न हो जाए। जरूरत यह है कि केंद्र व राज्य राजनीतिक दांवपेच से बाहर निकलें और आतंकवाद के खिलाफ एक सशक्त संस्था बनाएं।
गौतम चौरसिया, भरत नगर, दिल्ली

अखिलेश से उम्मीदें
हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि देश को मध्यावधि चुनाव में झोंकना समझदारी नहीं है। दरअसल, वह चाहते हैं कि संप्रग सरकार अपना कार्यकाल पूरा करे। यह दूरगामी सोच है। वैसे भी बेवजह जनता पर चुनाव का आर्थिक बोझ डालना ठीक नहीं है। अखिलेश ने जनता को यह भी भरोसा दिलाया है कि पिछली सरकार द्वारा बनाए गए भवनों, पार्कों और मूर्तियों को तोड़ने का काम नहीं किया जाएगा, बल्कि इनका इस्तेमाल जन कल्याण के लिए होगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री परिपक्व राजनेता हैं, जो बदले की राजनीति में यकीन नहीं करते। जनता भी यही चाहती है कि उत्तर प्रदेश देश का उत्तम प्रदेश बने।
राजेंद्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

चुनावी वायदों से नुकसान
अपने यहां लोक-लुभावन चुनावी वायदों की परिपाटी-सी है। लेकिन इसकी असली कीमत जनता-जनार्दन को ही चुकानी पड़ती है। मसलन, अगर जीती हुई पार्टी सरकार बनाने के बाद अपने वायदे से मुंह फेर लेती है, तो जनता खुद को ठगा महसूस करती है। वहीं, अगर चुनावी वायदे पूरे किए गए, तो एकाएक सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। इस बार भी विधानसभा चुनावों में अनेक दलों ने किसानों की कर्ज माफी का वायदा किया था। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सपा ने बेरोजगारी भत्ता देने का एलान किया था। लेकिन क्या इससे प्रदेश में और बेरोजगारी नहीं बढ़ेगी? जो लोग काम कर रहे हैं, वे भी काम छोड़कर बेरोजगारी भत्ता लेने लगेंगे। इसमें एक पेच और है। आखिर, इस तरह के भत्तों से कोई अपना वक्त कब तक गुजार सकता है? क्या यह बेहतर न होता कि सब हाथों को काम देने का वायदा किया जाता?
दिलीप गुप्ता, 11, छोटी वमनपुरी, बरेली

गठबंधन राजनीति के खतरे
गठबंधन सरकार में टकराव कोई नई बात नहीं है। जनता पार्टी की सरकार के वक्त से ही भारतीय राजनीति इसका अभ्यस्त हो चुकी है। जनता भी यह मान चुकी है कि सरकार में खींचतान से संतुलन बना रहता है। कोई भी फैसला आम सहमति के बिना नहीं लिया जा सकता। ऐसी सरकारों के फैसले देशहित व जनहित के लिहाज से अच्छे हो सकते हैं, बशर्ते निजी स्वार्थों की गुंजाइश और अस्थिरता का खतरा तनिक भी न हो। परंतु आजकल तो राजनीतिक पार्टियों के लिए निजी स्वार्थ ही सबसे ऊपर हैं, भले ही इसकी एवज में सरकार की बलि ही क्यों न चढ़ जाए। अब रेल किराया बढ़ाकर दिनेश त्रिवेदी ने क्या गलत किया? शायद, इसका जवाब न तो तृणमूल अध्यक्ष दे पाएंगी और न ही सरकार के मुखिया देंगे?
अनिल श्रीवास्तव, फरीदाबाद

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