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पूर्वाचल से हो सकती है दूसरी हरित क्रांति

दूसरी हरित क्रांति लाने में पूर्वाचल अहम भूमिका निभा सकता है। भूमि का अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए एक वर्ष में दो या उससे अधिक फसलें उगाना किसानों के लिए जरूरी हो गया है। उन्नत खेती के लिए किसानों को आधुनिकतम मशीनों का प्रयोग आना चाहिए। साथ ही मूल्य वर्धित विधियों का प्रयोग कर खेती को लाभप्रद बनाया जा सकता है।

बीएचयू के कृषि विज्ञान संस्थान की ओर से आयोजित दो दिवसीय किसान मेला का सोमवार को आईटी के क्रीड़ास्थल पर उद्घाटन करते हुए ये सुझाव भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक डॉ. एमएम पांडेय ने दिये। विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद भारतीय डेयरी अनुसंधान करनाल के निदेशक डॉ. एके श्रीवास्तव ने कहा कि आम धारणा है कि पनीर व दही का पानी बेकार हो जाता है, लेकिन उसका पानी बहुत महत्वपूर्ण व पोषण से भरपूर है। पूर्वाचल में देशी नस्ल के पशुओं की प्रजाति को संरक्षित करना जरूरी है।

उन्होंने कृषि क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले देशभर के 40 किसानों को सम्मानित भी किया। अध्यक्षता करते हुए कुलपति डॉ. लालजी सिंह ने कहा कि इस किसान मेले में महिला कृषकों की संख्या की बढ़ी हुई संख्या को देख कर खुशी हो रही है। ग्रामीण महिलाएं कुशल मैनेजर होती हैं।

जमीन की तेजी से घटती संख्या को देखते हुए अब एक साथ कई फसल उगाने की जरूरत है। साथ ही वैकल्पिक खेती भी करनी होगी। छतों पर भी सब्जियां उगाई जा सकती हैं। उन्होंने किसानों को बिचौलियों का आसरा छोड़कर सहकारी समितियों की मदद लेने का सुझाव दिया।

अतिथियों का स्वागत कृषि विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. आरपी सिंह ने किया। किसान मेला के संयोजक प्रो. एके सिंह ने इसके उद्देश्य से अवगत कराया। मेले में राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ एके श्रीवास्तव व मऊ डीएसआर के परियोजना निदेशक डॉ. एस राजेंद्र प्रसाद भी थे।

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