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अब तक याद हैं दीवारों पर लिखे वो चंद लफ्ज

वाराणसी कार्यालय संवाददाता

कभी हॉस्टल की दीवारों पर कुछ लिखा था। शरारत भरी बातें। शायद अब वो मिट गया हो, लेकिन याद है कि क्या लिखा था। आज 41 साल बाद जब साथ जुटे तो वे बातें बरबस जेहन में आ गईं। फिर खूब हंसे। एक-दूसरे की शरारतें बताईं। हॉस्टलों में गए, जहां कभी मस्तियां की थीं। उन विभागों में गए जहां शिक्षा लेकर बाद में उच्च पदों पर आसीन हुए। वहां हुए बदलावों को भी देखा। लंकेटिंग की याद की।आईटी बीएचयू के पहले बैच के छात्र शनिवार को स्वतंत्रता भवन के सीनेट हॉल में बिल्कुल बच्चों की तरह मिले। उन यादों को ताजा करते-करते उस युग में ही चले गये। 1966 में जब दाखिला लिया था तब आईटी नहीं था। तीन अलग-अलग शाखाएं थीं। 1969 में आईटी बना और इन छात्रों को 1971 में पहली डिग्री दी गई। तब कोर्स पांच साल का होता था।इस दौरान यह वादा भी किया गया कि ये पुरनिये साल में जब भी मौका मिलेगा, एक बार यहां जरूर आएंगे और अपने अनुभव यहां के छात्रों के अलावा अध्यापकों से भी बांटेंगे। इनमें से कई रिटायर हो चुके हैं और कुछ होने वाले हैं, लेकिन जब बात मौजमस्ती की चली तो अंदर का बालपन फूटकर बाहर आ गया। फिर याद आया कि जब प्रवेश लिया था, उसके कुछ ही दिन बाद ‘साइनडाई’ हो गई थी। तब काफी निराश हुए थे।

इस दौरान आईटी के निदेशक प्रो. जेएन सिन्हा ने बताया कि आईटी का एल्युमनी सेल काफी समृद्ध हो गया है और उसके पास सभी एल्सुमनी के बारे में जानकारी इकट्ठा है और जब जरूरत होगी उन्हें बुला लिया जायेगा। उन्होंने विवि के लिए हरसंभव कार्य करने का वायदा भी किया। आईटी गेस्टहाउस और गर्ल्स हॉस्टल पुरातन छात्रों के अनुदान से ही निर्मित किया गया है।आईआईटी जरूर बनना चाहिएपुरनिये कहते हैं कि जब 1972 से यहां आईआईटी-जेईई के जरिये प्रवेश शुरू हो गया, तभी यह मांग उठी थी कि इसे आईआईटी का दर्जा दे दिया जाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब तक यह काम नहीं हो सका। अब लोकसभा से पारित हो जाने के बाद इस विधेयक के राज्यसभा में लंबित रहने का कोई कारण नहीं है। लोग आईआईटी को लेकर जो चिंताएं व्यक्त कर रहे, उनका कोई आधार नहीं है। महामना द्वारा स्थापित यह विश्वविद्यालय किसी भी सूरत में बांटा नहीं जा सकता है। बेहतर क्वालिटी के बारे में सोचना चाहिए और इस दिशा में ठोस प्रयास करने चाहिए।दिवंगतों को श्रद्धांजलि भी दीपिछले 40 वर्षो के दौरान इस बैच के कुछ साथी दिवंगत भी हो चुके हैं। ऐसे करीब एक दर्जन साथियों को पुरनियों ने सीनेट हॉल में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी। अगली बार नाती पोतों के साथ आएंगेइस मिलन में इस बात पर खासतौर से विचार हुआ कि जबतक अपनी यादें अपनी पीढिम्यों को नहीं दिखाएंगे, तब तक इसका असली आनंद नहीं आएगा। सो वादा किया गया कि अगली बार आएंगे तो नाती-पोतों को भी साथ लाएंगे।ये हैं प्रमुख पुरनियेप्रो. एसके शर्मा, प्रो. केपी सिंह, ओपी आजाद, आरआर अय्यर, रणवीर खरे (अमेरिका), विपिनचंद जोशी (कतर), प्रमोद पंत, अशोक कुमार, आरसी तिवारी, राकेश गुप्ता, शिशिर चौहान, राना सेन, प्रानवीर खरे, मृणाल फुकन, वीरेंद्र स्वरूप गर्ग, केके पराशर, अनिल अग्रवाल, एचएस सिंह, मुनिंद्रनाथ मिश्र, एनके सिंह।ं

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