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शुक्रिया सचिन, यह अहसास देने के लिए

 सचिन तेंदुलकर के सौवें शतक ने पूरे देश को संतोष और खुशी का वैसा ही भाव दिया है, जैसा वल्र्ड कप जीतने के बाद हुआ था। सचिन ने 1989 में जब पहली बार पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेला था, तब उनकी उम्र महज 16 साल थी। एक मैच में, जब उन्होंने अब्दुल कादिर के ओवर में 27 रन बनाए थे, तभी लगा था कि महान बल्लेबाज आ गया है, जिसकी आने वाले दिनों में चर्चा होगी। यह चर्चा एक राष्ट्रीय उत्सव या राष्ट्रीय गम में बदल जाएगी, यह तो खुद सचिन ने भी नहीं सोचा था। सचिन दरअसल क्रिकेट खेलते-खेलते एक उभरते हुए देश की आत्मा और उसके विश्वास का प्रतीक बन गए।

बहुत कम लोगों को याद होगा कि 1989 में देश की हालत क्या थी। तब भारत की चर्चा दुनिया के नक्शे पर यदा-कदा ही होती थी। तब अंतरराष्ट्रीय अखबारों में भारत का जिक्र हादसों की वजह से होता था या फिर दंगों के कारण। भारत को लोग एक पुराना देश जरूर मानते थे। इसकी सभ्यता की इज्जत भी करते थे, लेकिन इसकी चर्चा में ‘मिस्ड-अपॉरच्युनिटी’ का भाव ज्यादा होता था। ऐसा देश, जो अपनी महान गौरवशाली परंपरा के बाद भी गरीबी में जीने के लिए अभिशप्त था। वह देश, जो सदियों की गुलामी से 1947 में निकला जरूर, लेकिन फिर कहीं भटक गया। कहने को लोकतंत्र था, लेकिन अराजकतावादी था। कहने को संसद थी, पर वह विचारधारा के ऐसे भंवर मे फंसी थी कि जितना बाहर निकलने की कोशिश करती, उतना ही दलदल में धसती जाती।

यह वह समय भी था, जब दुनिया में कई बड़े बदलाव हो रहे थे। सोवियत संघ में गोर्बाच्योव का सुधारवाद चल रहा था, चीन में छात्र विद्रोह पर उतारू थे। विद्रोह को कुचलने के लिए सरकार को टैंकों का सहारा लेना पड़ा था। मार्क्‍सवाद के अस्तित्व पर संकट के गहरे बादल मंडराने लगे थे। दक्षिण अफ्रीका मे रंगभेद नीति पर खड़ी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए निर्णायक लड़ाई शुरू हो चुकी थी। नेल्सन मंडेला ने एक बार फिर गांधी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीवित कर दिया था। पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी बर्लिन की कृत्रिम दीवार को तोड़ने के लिए उतावले हो रहे थे। पोलैंड की सॉलिडेरिटी सरकार और लेक वालेसा विश्व को विद्रोह का नया संदेश दे रहे थे।

भारत में हिंदुत्ववादी ताकतें हिलोरें ले रही थीं। केंद्र की राजनीतिक सत्ता और देश की सांस्कृतिक अस्मिता को इतनी गंभीर चुनौती कभी नहीं मिली थी। कुछ लोगों को यह भी लगने लगा था कि आरएसएस की आक्रामकता देश को खंड-खंड कर देगी। राजीव गांधी के मासूम, लेकिन कमजोर नेतृत्व ने इस संकट को और गहरा कर दिया था। कभी उनके विश्वासपात्र रहे वीपी सिंह ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को ऐसी हवा दी थी कि राजीव गांधी सरकार को अपनी  हार दीवार पर लिखी इबारत की तरह सच होती हुई दिख रही थी।

भारतीय टीम तब तक एक वर्ल्ड कप जरूर जीत चुकी थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी चुनौती को कोई गंभीरता से नहीं लेता था। वेस्ट इंडीज की तूती बोलती थी। ऑस्ट्रेलिया एक बार फिर से मजबूत टीम के तौर पर अपने को खड़ा करने की कोशिश कर रहा था। इस सबके बीच सचिन का टेस्ट में उतरना कोई बड़ी घटना नहीं थी। सचिन के खेल को देखकर तब किसी ने नहीं कहा था कि एक दिन इस लड़के की तुलना डॉन ब्रेडमैन से की जाएगी, नासिर हुसैन जैसा खिलाड़ी उन्हें ब्रेडमैन से भी महान बल्लेबाज बताने की हिमाकत करेगा और भारत में उसे क्रिकेट के भगवान का दर्जा दिया जाएगा।

अजीब इत्तफाक था कि उस वक्त देश भी कंगाली से जूझ रहा था और उसे अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था। आर्थिक सुधार की शुरुआत में तब किसी ने नहीं सोचा था कि महज 15 साल में भारतीय अर्थव्यवस्था की चर्चा पूरी दुनिया में होगी और उसे दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक के तौर पर आंका जाएगा। साथ ही अमेरिका की हालत खराब होगी, और यूरोप घुटनों पर होगा। देश की किस्मत बदली। क्रिकेट में भी उसकी ताकत का लोहा माना जाने लगा।

जो खेल कभी लंदन व मेलबोर्न से चलता था, अचानक उसका सत्ता केंद्र हिन्दुस्तान हो गया। दुनिया में क्रिकेट रहेगा या नहीं, यह भारत तय करने लगा। सचिन ने अपनी प्रतिभा से पूरी दुनिया को भारत की ओर देखने के लिए मजबूर कर दिया। सौरव गांगुली के तेज दिमाग, राहुल द्रविड़ के संयम, वीवीएस लक्ष्मण की कलात्मकता, सहवाग के विस्फोट ने सचिन की नैसर्गिकता को अपराजेय बना दिया।

वह सेंचुरी पर सेंचुरी मारते गए। पहले गावस्कर का 34 शतकों का रिकॉर्ड तोड़ा, फिर सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले। बल्ला बोलता गया, दुनिया विस्मय से इस जादूगर व उसके साथियों का खेल देखती गई। जिस टीम को कभी ढाई बल्लेबाजों की टीम कहा जाता था, जो कभी सिर्फ मैच हारने या बचाने के लिए खेलते थे, वो अब चाहे वनडे हो या फिर टेस्ट, सब में नंबर वन बन गए। धौनी ने सौरव की परंपरा को आगे बढ़ाया ट्वंटी-20 का वर्ल्ड कप जीता, फिर 28 साल बाद वनडे का वर्ल्ड कप भी जीत लिया। आईपीएल ने क्रिकेट की दुनिया को बुनियादी तौर पर बदल डाला।

2011 में वर्ल्ड कप की जीत के बाद जितना तिरंगा लहराया गया, उतना तो कभी मैंने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं देखा था। आधी रात के बाद मुंबई की सड़कें जाम हो गईं। आमिर खान को घंटों लगे अपने घर पंहुचने में, लेकिन पूरा देश इस एक जीत में झूम रहा था। राष्ट्रीय एकता का ऐसा मंजर देश ने पहले शांति काल में कभी नहीं देखा था। यह उभरते भारत का नया राष्ट्रवाद था, जो अपनी मौजूदगी को पूरी शिद्दत के साथ दुनिया को अहसास कराना चाहता था। सचिन इस दौर में क्रिकेट के सबसे बड़े आईकॉन रहे हैं। वह इस नए राष्ट्रवाद के सबसे बड़े प्रतीक भी बन गए। उनकी हार पर देश हारने लगा और उनकी जीत पर देश नाचने लगा।

ऐसे में इस प्रतीक ने जब सौवां शतक जड़ा, तो देश का बजट भी फीका पड़ गया। बजट तो हर साल आता है, लेकिन राष्ट्र की खुशी में जीने-मरने का मौका तो सदियों में कभी-कभी मिलता है। सचिन, देश को एक सपने, एक सूत्र मे बांधने, इतनी खुशी देने के लिए शुक्रिया!
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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