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मौसम और आदमी का मिजाज

बसंत बीता, होली भी गुजर गई, पर कभी सर्द हवाएं, तो कहीं बर्फबारी। जीवन-स्तर में हुई हो या न हुई हो, मौसम में तरक्की करते-करते हम यूरोप-अमेरिका के समकक्ष आ पहुंचे हैं। अपनी सड़कें दो और चार पहियों के वाहनों से जाम हैं, उनकी बर्फ से। सर्दी हमारे लिए पूंजीवादी ऋतु है, उनके लिए अर्थव्यवस्था है! विद्वान भले ही कहें कि इंसान को कुदरत के करीब रहना चाहिए, सर्दी इस प्रयोग के अनुकूल नहीं है।

हमें डर है। वातावरण की बर्फ जैसे इंसान के मन में कहीं जा जमी है। तभी तो रिश्तों की ऊष्मा का अभाव दिनोंदिन नजर आता है। लगता है कि बाहर ठंडी हवाएं हैं, अंदर तो लगातार बर्फबारी है। इसका मौसम के मिजाज से ताल्लुक नहीं है। यह हर ऋतु की कहानी है। गरमी, बरसात, शिशिर सब में यही आलम है। चूहे, चींटी, चिड़ियां, झींगुर वगैरह-वगैरह में भले कुछ रिश्ते-नाते हों, इंसानों में नहीं बचे हैं। बात तक करने की फुरसत नहीं है। कुछ पापी पेट की भागदौड़ में व्यस्त हैं, कुछ धन कुबेर बनने की जुगाड़ में, कुछ सत्ता की चकाचौंध में, तो कुछ इंटरनेट के आभासीय यथार्थ (वचरुअल रियलटी) में। बेतरतीब कुरसी, चौकी, गद्दे और तख्त की पुराने जमाने की बैठक अब आधुनिक सोफे, कालीन, बुक रैक से सजे ड्राइंग रूम में बदल गई है।

हां, कूड़ा कालीन के नीचे है और बिना इजाजत या पूर्व निर्धारित वक्त के, प्रवेश वर्जित है। गांवों तक में सहज बातचीत के लिए चौपाल का चलन अब कहां रह गया है? शहरों में मिलना-जुलना सिर्फ स्वार्थवश है। बिना मतलब भाई भाई की शक्ल नहीं देखता है, बेटा बाप की। मौसम की सर्दी तो जाते-जाते कभी चली ही जाएगी। हमें इंतजार है, जब मानव के मन की यह बर्फ पिघले। जाने संबंधों के वर्तमान अंधेरे में स्नेह का सूरज अब उगे भी कि नहीं।

मौसम के अनुपात में आदमी का तापमान बढ़ा है। कहीं बीमार डॉक्टरों से भिड़े हैं, तो कहीं ग्राहक दुकानदारों से। कहीं कार चालकों में हॉर्न बजाने पर कहा-सुनी, कभी आगे निकलने पर मारपीट। कहीं घर पर पत्नी से झांय-झांय, तो कभी पड़ोसी से गाली-गुफ्ता। मौसम की ज्यादती तो एक उम्र के बाद ही सताती है, पर आदमी के मिजाज-मीटर का पारा तो दिनोंदिन चढ़ रहा है।
गोपाल चतुर्वेदी

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