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मौन की महिमा

जमाना बातूनी हो गया है। लंबी-लंबी चर्चाएं और बहसबाजी। टेलीविजन ने और बुरी आदत डाल दी है। एक पैनल होता है और कोई भी एक खबर लेकर उस पर घंटों चर्चा चलती है। उससे नतीजा तो कुछ नहीं निकलता, लेकिन दर्शक और संयोजक को ऐसा लगता है, बहुत कुछ घट रहा है। उनके शब्द लोगों के मन पर इतने हावी होते हैं कि उन्हें ख्याल ही नहीं रहता कि वे क्या बोल रहे हैं और क्यों बोल रहे हैं। जितना ज्यादा बोलें, उतना गलत बोलने की आशंका रहती है। जो नहीं बोलना था, वह भी निकल जाता है। फिर बाद में लीपापोती करनी पड़ती है, माफी मांगनी पड़ती है।

बोलने से जितनी गलतफहमियां और समस्याएं पैदा होती हैं, उतनी मौन से नहीं होतीं। बोलना बहुत थकाने वाली प्रक्रिया है। इससे शरीर में गरमी पैदा होती है। जब लोग इतने पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी नहीं थे, तब कम बोलते थे। कम बोलते थे, ज्यादा प्रामाणिक थे। जो सच्चा भाव होता, वही कहते थे। आज शरीर में ऊष्णता बढ़ने का एक कारण यह भी है, जरूरत से ज्यादा बोलना। आध्यात्मिक रुझान वाले लोग अपनी दिनचर्या में मौन को शामिल करते हैं। मौन का अर्थ यह नहीं कि आप बिल्कुल ही बोलना छोड़ दें। ओशो ने मौन का अर्थ माना है, ‘जितना आवश्यक हो, उतना ही बोलें।’

अगर आप अपने शब्दों पर ध्यान देने लगें, तो आपको अहसास होगा कि आपके वार्तालाप में कितने सारे शब्द निर्थक हैं। बोलने से पहले सोचें, क्या यह जरूरी है, या इससे कम शब्दों में काम चल जाएगा? हो सकता है, इशारों से काम चल जाए। इससे धीरे-धीरे आपके भीतर ऊर्जा इकट्ठी होगी और आप आंखों से या स्पर्श से बोलने लगेंगे। आपके शब्दों में अधिक सच्चई होगी, क्योंकि वे आपकी अंतरात्मा से आएंगे। कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी, पर लोग आपके सान्निध्य में प्रसन्नता अनुभव करेंगे। दिमाग की तनी हुई नसें शिथिल होंगी और मस्तिष्क को भी विश्रम मिलेगा।
अमृत साधना

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