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दवा से बढ़ता मर्ज

हम चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए आविष्कारों के बारे में रोजाना सुनते हैं, जिनसे ऐसी बीमारियों का इलाज मुमकिन हो रहा है, जो अब तक लाइलाज थीं। लेकिन क्या आने वाले वक्त में चिकित्सा विज्ञान आम बीमारियों का भी इलाज नहीं कर पाएगा और लोग सर्दी-जुकाम या छोटी-मोटी चोट लगने से मरने लगेंगे? यह बात मजाकिया नहीं है, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की महानिदेशक मार्गरेट चान ने यह आशंका जताई है।

चान का यह कहना है कि शायद एंटीबायोटिक दवाओं का युग खत्म होने को है, क्योंकि बैक्टीरिया ने तमाम एंटीबायोटिक दवाओं का प्रतिरोध सीख लिया है। उनका कहना है कि एंटीबायोटिक की उपयोगिता खत्म होने का मतलब है, आधुनिक चिकित्सा के जिस युग में हम जी रहे हैं, उस युग का अंत। सारी दुनिया में एंटीबायोटिक दवाओं का प्रतिरोध बढ़ रहा है और हम अपनी सर्वश्रेष्ठ एंटीबायोटिक को बेअसर होते देख रहे हैं। चान की बातों में सच्चाई है, हम लगातार ऐसे बैक्टीरिया के बारे में सुन रहे हैं, जो किसी भी एंटीबायोटिक की परवाह नहीं कर रहे। टीबी के ऐसे मरीज यूरोप व अमेरिका जैसे विकसित क्षेत्रों में बढ़ रहे हैं, जिन पर टीबी की पुरानी तो क्या आधुनिकतम दवाएं भी असर नहीं कर रही हैं।

पिछले दिनों ई. कोलाई बैक्टीरिया के संक्रमण से ब्रिटेन परेशान रहा। भारत जैसे देशों के बारे में तो कुछ कहना ही मुमकिन नहीं है, क्योंकि हमारे यहां ऐसा व्यवस्थित चिकित्सा तंत्र नहीं है, जो सारी बातों को दर्ज करता हो। दूसरा, हमारे देश में एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल इतना अराजक ढंग से होता है कि दवा प्रतिरोध हमारे देश के बैक्टीरिया में तो भरपूर हो गया होगा।

जब महान वैज्ञानिक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने अनजाने में ही पेनिसिलिन को ढूंढ़ा था, तो चिकित्सा जगत में क्रांति आ गई थी। इसके पहले यह समस्या थी कि बैक्टीरिया का संक्रमण होने पर उसे रोका कैसे जाए? पेनिसिलिन ने दूसरे विश्व युद्ध में हजारों सैनिकों की जानें बचाईं। सजर्री भी उसके बाद आसान हो गई, क्योंकि एंटीबायोटिक दवाएं जख्म को संक्रमण से बचाती थीं।

लेकिन एंटीबायोटिक को हर समस्या का हल मान लिया गया। चिकित्सा विज्ञान एक सरल फॉमरूले पर काम करने लगा कि सूक्ष्मजीवी हमारे शत्रु हैं, इन्हें मार दो, तो बीमारियां खत्म हो जाएंगी। अध्ययनों ने पाया है कि अक्सर 90 प्रतिशत तक एंटीबायोटिक बेकार इस्तेमाल होती हैं। जैसे सर्दी-जुकाम में एंटीबायोटिक का कोई इस्तेमाल नहीं है, क्योंकि यह वायरस संक्रमण है, लेकिन ज्यादातर डॉक्टर जुकाम के मरीजों को एंटीबायोटिक देते हैं।

हम ऐसे जीवों के खिलाफ लड़ रहे हैं, जो अपने को बदलने और नई परिस्थितियों के अनुकूल ढलने में उस्ताद हैं। सब बैक्टीरिया हमारे दुश्मन नहीं हैं, इनमें दोस्तों की तादाद कहीं ज्यादा है और एंटीबायोटिक दवाएं दोस्त और दुश्मन में फर्क नहीं करतीं। हमारे शरीर में ‘अपनी’ जितनी कोशिकाएं होती हैं, उससे दस गुना ज्यादा सूक्ष्मजीवी रहते हैं और हमारे शरीर के विभिन्न काम करते हैं। अब चिकित्सा विज्ञान को बैक्टीरिया को मारने का दर्शन छोड़ना होगा, क्योंकि इस प्रक्रिया में खतरनाक बैक्टीरिया पैदा हो रहे हैं।

जरूरी यह है कि चिकित्सक एंटीबायोटिक्स का ज्यादा इस्तेमाल रोकें, ताकि उन दवाओं का प्रभाव बचा रह सके। हर जगह से सूक्ष्मजीवी हटाने की मुहिम ने मानव शरीर की वह प्रतिरोधक क्षमता खत्म कर दी है, जो सूक्ष्मजीवियों के साथ रहने से पैदा होती है। पश्चिम में माना जा रहा है कि थोड़ी-बहुत गंदगी अच्छी है, क्योंकि इससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। फिर भी संकट तो है ही, क्योंकि जो खतरनाक बैक्टीरिया पैदा हो गए हैं। इनका कोई उपाय नजर नहीं आता। इसकी दवा तो डब्ल्यूएचओ के पास भी नहीं है।

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