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सबसे बड़ा सेंचुरियन

भारतीय जनमानस पर सचिन तेंदुलकर के गहरे प्रभाव को कोई भी सही मायने में नहीं समझ सकता। हां, वे लोग इस असर का अहसास कर सकते हैं, जिन्होंने पिछले दो दशकों के दौरान थोड़ा-बहुत वक्त भी दर्शक दीर्घा में गुजारा हो और टीम इंडिया के खेलते हुए देखा हो। तेंदुलकर की हर गतिविधि पर लोगों की नजरें रहती हैं। वह एक सेलिब्रिटी से ज्यादा की हैसियत रखते हैं। एक अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में उनकी पूजा होती है। शायद ही खेल के इतिहास में ऐसी कोई नजीर हो।

उनकी तस्वीरें, होर्डिंग्स और बैनर सभी जगह होते हैं। फिर भी वह खुद पर दबाव महसूस नहीं करते। मसलन, जब वह दिल्ली में बल्लेबाजी कर रहे हों, तो बहुमंजिली इमारत की ऊंचाई पर लगी उनकी विज्ञापनी तस्वीर उन्हें टकटकी लगाए देखती रहती है। जब भी वह सार्वजनिक जगहों पर जाते हैं, जनसैलाब उमड़ पड़ता है। लोकप्रियता की वजह से आज उन पर धनों की बारिश हो रही है, लेकिन इसे पाने के लिए सचिन को कीमत भी चुकानी पड़ी है। किशोर उम्र में ही वह सबके नायक बन बैठे थे। वह आज भी सबके नायक हैं।

दरअसल, असामान्य होकर भी सामान्य बने रहना यही तेंदुलकर की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैदान पर एक विकेट के गिरते ही खामोशी पसर जाती है। फिजा में शोर-शराबे की जगह अटकलों की सुगबुगाहट होने लगती है। तब छोटा कद व गठीले बदन का एक खिलाड़ी मैदान पर तेज कदमों के साथ आता है। वह सिर उठाकर आसमान की ओर देखता है, फिर पलकें झपकाकर प्रकाश को समायोजित करता है और मैदान के बीचोबीच से अपना रास्ता बनाते हुए पिच की ओर चल देता है।

जब सचिन ऐसा करते हैं, तो फिर स्टेडियम में शोर का विस्फोट होने लगता है। जब तक वह क्रीज पर होते हैं, उनके हर रन के साथ दर्शक तालियां पीटते रहते हैं। सचिन-सचिन...कहकर चिल्लाते हैं। उनके हर एक या दो रन के बाद दर्शकों का उत्साह बढ़ता जाता है। जब गेंद दो क्षेत्ररक्षकों के बीच से सीमा के पार चली जाती है, तो यह उत्साह अपने चरम पर होता है। और आखिरकार जब वह आउट होते हैं, तो स्टेडियम में सन्नाटा पसर जाता है।
द गाजिर्यन, लंदन

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