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‘खाने के लिए कुछ न हो तो रेडियो बेकार है’

बिहार में महादलित विकास योजना के तहत बांटे गए रेडियो को कई लोगों ने देसी शराब और मांस खाने के लिए बेच दिया। पटना जिले के धनरुआ प्रखंड में पिछले कुछ दिनों में डेढ़ हजार से अधिक महादलितों के डेढ़ सौ से दो सौ रुपये में रेडियो बेचने की रिपोर्ट मिली।

महादलित रेडियो योजना के एक लाभार्थी अंजनी गांव के ब्रह्मदेव मांझी ने कहा कि हमारे पास खाने को कुछ नहीं है। हम रेडियो का क्या करेंगे? इसकी बैटरी का पैसा कहां से आएगा? इसलिए हमने रेडियो बेच दी।

उन्होंने कहा कि रेडियो बेचने से मिली राशि से उसने अपने दोस्तों के साथ एक छोटी पार्टी की, जिसमें उन लोगों ने देसी शराब पिया। महादलितों में रेडियो इसलिए बांटी गई थी, ताकि वे शिक्षा और स्वच्छता का महत्व समझें, तम्बाकू और शराब जैसी बुरी आदतों को छोड़ें।

इसी योजना के एक अन्य लाभार्थी डोमन मांझी ने कहा कि रेडियो से उन्हें लाभ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि जब पेट खाली हो, तो गीत और समाचार अच्छे नहीं लगते। उन्होंने कहा कि उनके साथ कई और लोगों ने भी अपने रेडियो बेच दिये और इससे मिली राशि का उपयोग देसी शराब और मुर्गे का मांस खाने में किया।

धनरुआ प्रखंड की कल्याण अधिकारी साधना कुमारी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हम क्या कर सकते हैं? हम इसे रोक नहीं सकते। प्रखंड विकास अधिकारी के मुताबिक अभी तक 5,552 रेडियो वितरित किए जा चुके हैं और 663 का वितरण किया जाना बाकी है।

पिछले महीने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार महादलित विकास योजना के तहत महादलित रेडियो योजना की शुरुआत की। राज्य सरकार ने 22 महादलित परिवारों को रेडियो बांटने का फैसला किया है।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में 22 दलित उपजातियों में 21 की पहचान महादलित के रूप में की गई है। इनमें मुसहर, भुइयां, डोम, चमार और नट समुदाय आते हैं।

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