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दिल्ली में बढ़ी है बैंड कल्चर की चाह

बीते कुछ वर्षों में दिल्ली की तस्वीर में कई रंग बदले हैं। पश्चिम के मॉल कल्चर से लेकर मेट्रो तक, सभी को दिल्लीवालों ने पूरी तरह से अपना लिया है। इसी तरह पश्चिमी कलाओं (नृत्य, संगीत) ने भी अपनी विविधता से राजधानी के लोगों के दिलों में जगह बना ली है। शास्त्रीय संगीत के मुकाबले यहां की नई पीढ़ी पर पाश्चात्य संगीत का नशा ज्यादा हावी हो रहा है।

यूं तो दिल्ली में पिछले 20 वर्षों में पॉपुलर हुए संगीत की कई शैलियों ने अपनी जगह बनाई है, लेकिन गत छह-सात वर्षों में यहां पर भारतीय संगीत के साथ पश्चिमी कलाओं ने भी अपने पैर तैजी से पसारे हैं। बीच में एक समय ऐसा भी था, जब बॉलीवुड ने इन सब में बाजी मार ली थी।
मगर, युवाओं ने बदलाव के तौर पर पश्चिमी कलाओं को तरजीह दी। मौजूदा समय में संगीत पर नए एक्सपेरिमेंट्स को ज्यादा पसंद किया जा रहा है। साथ ही लोगों में कला को लेकर खुलापन भी आ गया है।   

मेरा मानना है कि दिल्ली के पास शास्त्रीय संगीत के साथ ही हैवी मेटल, जैज, ब्लूज व पॉप आदि शैलियों के लिए भी बड़ी संख्या में श्रोता व दर्शक मौजूद हैं। यहां ऐसे भी कई स्थान हैं, जहां इकट्ठा होकर लाइव परफॉमेर्ंस देखी जा सकती है। दिल्ली में रेस्तरां और कैफे कल्चर बढ़ा है, जिससे लोगों में बैंड कल्चर की चाह बढ़ी है। आज भारतीय संगीत को पश्चिमी धुन के साथ मिलाकर बेहतरीन फ्यूजन पेश किया जा रहा है। मेरा मानना है कि संगीत चाहे किसी भी तरीके से पेश किया जाए, वह हमेशा सकारात्मक ही रहेगा।
( प्रियंका सरीन से बातचीत पर आधारित)

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