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हां, काबुल में गधे होते हैं

उर्दू के महान व्यंग्यकार और शायर इब्ने इंशा अपने यात्रा संस्मरणों के लिए भी जाने जाते हैं। यूनेस्को में नौकरी की वजह से वे खूब देश-दुनिया घूमे और उनके दिलचस्प किस्से कहे। यहां प्रस्तुत है काबुल यात्रा का एक किस्सा, जिसे ‘दरवाजा खुला रखना’ (सं. पद्मा सचदेव, प्र. सस्ता साहित्य मंडल) से साभार लिया गया है।


हम और रमजान शरीफ किबला काबुल में एक ही रोज वारिद हुए। पाकिस्तान इस लिहाज से अफगानिस्तान के मुकाबले में पसमांदा है कि यहां अभी माहे शाबान चल रहा था। पिशावर से डीन होटल की मेजबानी का लुत्फ उठाते और चिलगोजे ठूंगते हम जहाज में सवार हुए थे, लेकिन पौने घंटे बाद काबुल के खूबसूरत हवाई अड्डे पर उतरे तो पता लगा कि साहबो, आज हर तरफ यकुम रमजान की तातीम है। आपकी बाछों पर जो चिलगोजों के छलके लगे हैं, उन्हें अच्छी तरह साफ कर लीजिए।

काबुल में हम दो चीजों का रौब दिल में लेकर गए थे। एक सर्दी का, दूसरा रमजान शरीफ का। सर्दी के डर से हमने जो पोस्तीनों, दुहरे-तिहरे स्वैटरों-मफलरों, तरह-तरह की टोपियों और कनटोपों, दस्तानों और कुतुब शुमालीवाले ओवरकोटों का इंतिजाम किया था, जाड़े मियां शायद उसका जिक्र सुनकर दुबक गए और काबुल वालों से कहा कि यह शख्स यहां से जाएगा तो फिर तुम लोगों से समझूंगा। जितने दिन हम काबुल में रहे, जाड़ा बस ऐसा ही था, जैसा पिंडी में होता है। पिशावर में था, बल्कि लाहौर में भी। कोयटा से इक जरा सर्दी की लहर आ जाए तो ऐसा नक्शा तो कराची में भी हो जाता है। दस्ताने, स्वैटर, मफलर और कनटोप और हबीबुल्लाह शहाब वाला महा ओवरकोट देख-देख कर हम इतने झल्लाया किए। एक रोज भी कड़ाके की दंदाशकन सर्दी पड़ जाती तो उनका मसरफ निकल आता और हमें गिला न रहता।

रोजों के मुताल्लिक अपने अफगान और पठान भाइयों के कट्टर रवैए का जिक्र भी हम सुन चुके थे। बेशक होटल जिसमें हम ठहरे, वह रोशन खयाल और मगरबी किस्म का था - फिर भी लोगों ने बता रखा था कि सुना है वहां तड़के ही मुसाफिरों को टांगों से घसीट कर उठा देते हैं और तलवार की नोक पर रोजा रखवाते हैं, अलहमदुलिल्लाह यह अंदेशे भी ताबिल साबित हुए। हमने काबुल के रेस्तोराओं और भटियारखानों को इसी तरह एहतराम के पर्दे लटकाए कारोबार करते देखा, जैसा कराची में देखते हैं। हमने एक आध बार रोज रखने का इरादा जाहिर किया तो हमारे एक अफगान दोस्त ने कहा कि शौक से रखो। हम मना नहीं करते। लेकिन इतना देख लो कि तुम सफर में हो और सफर में रोजे की एहतियात रखी जाती है। यह लोग हमारे जजबा-ए-ईमानी को इतनी ढील न देते तो हमारी रोजा कुशाई की खबर काबुल से आती।

काबुल में दो ही अच्छे होटल हैं। काबुल और स्पनजर-स्पनजर तो अभी हाल ही बना है और अल्ट्रा मॉडर्न गिना जाता है। अगरचे ज्यादा बड़ा नहीं। काबुल पुराना है। वजेदाराना शरीफाना और आरामदेह। बाहर से उसकी स:मंजिला इमारत बेरंग-सी है, लेकिन अंदर जाइए तो लाउंज और कमरे और साजो-सामान सब नफीस। हम काबुल होटल में उतरे। कमरे का भाड़ा ठहराया-मालूम हुआ तीन सौ अफगानी रोजाना देने होंगे। दस फीसदी सर्विस उस पर मुताजाद। नाश्ता और खाना इसके अलावा। किसी चीज के दाम हम सैकड़ों में सुनें तो हमें हमेशा इखतलाज हो जाता है। लेकिन यह मालूम करके सुकूल हुआ कि एक अफगानी हमारी मरहूमा दुवन्नी के बराबर होता है। हमने सौ रुपए पाकिस्तानी दिए और होटल वाले ने आठ सौ अफगानी हमें गिन दिए। हिसाब से चालीस-पैंतालीस रुपए का कमरा पड़ा, जिसे कम नहीं तो ज्यादा भी नहीं कह सकते, लेकिन हमारे दोस्त डॉक्टर गुलबर्ग तो यह दाम सुन कर उछल ही पड़े। क्योंकि डॉलर के हिसाब से गिनें तो यही अफगानी एक आने का पड़ता है और तीन सौ अफगानी का मतलब हुआ चार डॉलर रोजाना। बात यह है कि अफगानिस्तान में सिक्के की अंतरराष्ट्रीय कीमत मुकर्रर नहीं है। हर रोज बाजार का भाव निकलता है। डॉलर के सत्तर-पिछत्तर अफगानी मिल जाते हैं। चीज के दाम सुन कर उसे फौरन पाकिस्तानी सिक्के में ढालते तो वह खासी महंगी मालूम होती। गुलबर्ग साहब की आंखें अरजानी देख कर चमक उठतीं। नतीजा यह हुआ कि हम काबुल जैसे गए थे, वैसे ही घूम-फिर कर आ गए। कुछ न ला सके। और डॉक्टर गुलबर्ग वहां से लदे-फुंदे गए।

पिशावर के हवाई अड्डे पर हमने अपने हमसफरों में एक अधेड़ उम्र के बुजुर्ग को देखा कि लंबी सुर्ख दाढ़ी है और सिर पर भी कंघी से बेनियाज बालों को झाड़ खड़ा है। थोड़ा लंगड़ाते हैं और छड़ी लेकर चलते हैं। फूलदार वास्केट पहने हुए थे। यानी उनकी सज-धज वजअ-कतअ सबसे अलग थे। हम पी.आई.ए. के काउंटर पर अपना टिकट दिखा रहे थे कि वह मुस्कुराते हुए हमारे पास आए और फरमाया, तुम्हारे पास यह एस.ए.एस. यानी स्केंडिनेवियन सर्विस का टिकट कहां से आ गया। हमने बताया कि यूनेस्को जिसकी तरफ से हमने यह सफर इख्तियार किया है, उसने पेरिस से इसका इंतजाम किया था। बोले, मुझे यूं जुस्तुजू हुई कि मैं डेनमार्क का हूं और एस.ए.एस. मेरे वतन की कंपनी है। इस पर बात चल निकली। हमने उन्हें बताया कि आपके वतन की जियारत भी हम कर चुके हैं। कोपेनहेगन के अलावा अलसी नूर भी गए थे, जहां हेमलेट का किला है और जहां से समंदर पार स्वीडन नजर आता है।

बोले: मुझे अफसोस है कि मैंने सारी उम्र डेनमार्क में गुजार कर अलसी नूर आज तक नहीं देखा। हमने यह कह कर उनका ढाढ़स बंधाया कि हमने भी कराची में आधी उम्र गुजारी है, लेकिन मंघू पीर नहीं हुए। ज्यादा तफसील में हम नहीं गए, ताकि हमारा मंघू पीर उनके अलसी नूर के मुकाबले कच्च न पड़ जाए।
डॉक्टर गुलबर्ग दवा-दारू वाले डॉक्टर हैं, लेकिन नुस्खों के अलावा किताबें भी लिखते हैं और यही हमारी उनसे दोस्ती की वजह हुई। उन्होंने बताया कि उनकी किताब ‘एस्कीमो डॉक्टर’ बरतानिया और अमरीका के अलावा कई मुल्कों में छप चुकी है। हमने रीडर डायजेस्ट में उसका जिक्र या खुलासा पढ़ा था और कुछ-कुछ याद था। यह सुन कर वह और खुश हुए और अपनी बीवी से कहा, देखो यह शख्स कितना पढ़ा-लिखा है। इसने रीडर डायजेस्ट में मेरी किताब का जिक्र पढ़ा है। फ्रांसीसियों की तरह ‘र’ का तलफ्फुज वह हमेशा ‘ग’ ही करते रहे। डॉक्टर गुलबर्ग मुहिमजू आदमी हैं। बरसों वह ग्रीनलैंड में एस्कीमों के साथ रहे। उनकी जबान और मआशरत अख्तियार की। उन्हीं का सा बेनमक खाना खाते रहे। बर्फ के झोंपड़ों में कयाम किया और फिर यह किताब लिखी। अब मियां-बीवी एशिया और मकारिकी ईद के दौर पर निकले थे! केनेडा, हिंदुस्तान, थाइलैंड और नेपाल होते हुए पाकिस्तान आए थे। अब काबुल और तेहरान होकर वतन वापसी का प्रोग्राम था। हिंदुस्तान में यह लोग एक शब ठहरकर भागे थे और उसी दिन नेपाल रवाना हो गए।

पाकिस्तानियों - विशेषकर पिशावरवालों के यह बहुत मोतरिफ थे कि बड़े तपाक और खुलूस से मिलते हैं। पी.आई.ए. की खासतौर पर तारीफ करते थे कि उसके आदमी बहुत खलीक और मुतवाजअ हैं। हां, अपने पिशावर वाले होटल के नाम से बेमजा होते थे। कहते थे कि यह नजरबट्ट है, ताकि पाकिस्तान को नजर न लग जाए। देखो काबुल होटल में यह चार डॉलर रोजाना का कितना अच्छा कमरा है। इसे गरम रखने का मर्कजी निजाम भी है। कालीन, फर्नीचर, सर्विस सभी कुछ मुनासिब। पिशावर में मैं तीन रोज रहा। और उस बाबा आदम के जमाने के कमरे के तेरह डॉलर रोजाना देता रहा। यही नहीं, उन लोगों ने पांच रुपए रोजाना उस लकड़ी के भी मुझसे वसूल किए, जो कमरा गर्म रखने के लिए रोजाना जलानी पड़ती थी।

जाते हुए जिन लोगों ने हमने पूछा था कि क्या काबुल में गधे नहीं होते? उनकी जानकारी के लिए गुजारिश है कि होते हैं और बहुत होते हैं। यहां हमारा मतलब चार टांग वाली बिला सींग की मखलूक से है और बहुत होते हैं। दो टांग वाले भी यकीनन होंगे। हमने ज्यादा जुस्तजू नहीं की। यह गधे वह थे, जो जरनिगार पार्क के सामने कतार-दर-कतार खड़े थे और उनके पालान संतरों से भरे थे। यहां संतरे तुल कर बिकते हैं। डॉक्टर गुलबर्ग की बीवी संतरों पर मचल गईं और बोलीं, इनका भाव पूछो। हमने भाव पूछा, ‘आगा चंद अस्त?’ ईरान की तरह यहां भी यह मालूम हुआ कि फारसी बोलना आसान है, समझना मुश्किल। आगा ने जो जवाब दिया, वह हमारे पल्ले न पड़ा हालांकि हमने चे! चे? करके एक-दो बार वज़ाहत भी चाही। इन गैर मुलकियों को यह बताना गैर जरूरी था कि यह गधे वाला इन अल्फाज़ में अदाए मतलब से कासिर है, जो हमारी समझ में आ सकें। इसलिए हमने कहा छोड़िए, बहुत महंगा देता है। लेकिन वह खातून थोड़ी दूर एक और गधे के पास मचल गईं कि यहां से ले लो। यह सस्ता देगा। हमने एक बाट की तरफ इशारा करके संतरों वालों से कहा कि आगा बस ई कदर दे दो। उसने तोला तो चार संतरे पड़े। कीमत हमने न पूछी कि समझने-समझाने में दिक्कत न हो। आखिर बाहम जबान समझने न समझने का मामला हमारा और हमारे अफ़ग़ान भाइयों का है। डेनमार्क वालों को इससे क्या मतलब। हमने दस अफ़ग़ानी का नोट दिया। उसने चार अफ़ग़ानी काटकर बाकी रेजगारी हमें दे दी। डॉक्टर गुलबर्ग और उनकी बीवी ने हमारा बहुत शुक्रिया अदा किया और कहा कि इस दयारे गैर में जहां हमारी जबान और अंग्रेजी समझने वाला कोई नहीं, तुम हमारे साथ न होते तो हम क्या करते। हमने मुनासिब शब्दों में कसर नफसी करने के बाद कहा कि ख़ैर, इनसान इनसान के काम आता ही है।

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