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अन्ना आंदोलन की दास्तान

सभी राजनीतिक घटनाक्रमों के पीछे की उठा-पटक साहित्यिक दृष्टि से औपन्यासिक कलेवर लिए रहती है। गत वर्ष अन्ना हजारे की जन लोकपाल कानून के पक्ष में भूख हड़ताल के पर्दे के पीछे की कहानी इससे कुछ अलग नहीं है। फर्क केवल इतना भर है कि इसके प्रमुख पात्र आमजन ही रहे और राजनेता अतिथि भूमिकाओं में दिखाई दिए थे और वो भी खलनायक सरीखे! बहरहाल, अन्ना आंदोलन पर जाने-माने पत्रकार आशुतोष की यह अंग्रेजी पुस्तक उपन्यास न होने के बावजूद, कुछेक स्थानों पर कुछ वैसा ही आनंद देती है। विशेषकर अन्ना आंदोलन की समूची तैयारी और पृष्ठभूमि से जुड़े अन्य विवरणों के संदर्भ में। मसलन, कितने लोग जानते हैं कि ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का चेहरा बाबा रामदेव को बनना था और उस समय तक अन्ना हजारे तस्वीर में ही नहीं थे। एक और तथ्य कि उपरोक्त गैर-सरकारी संगठन के संस्थापक-सदस्यों में से एक श्री श्री रविशंकर भी हैं।

बहरहाल, आशुतोष चूंकि खुद गत अगस्त के उन तेरह दिनों तक लगातार रामलीला मैदान में उपस्थित रहे थे, इसलिए उनके बयान पर यकीन न करने की कोई वजह भी नहीं रह जाती। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर वह पुस्तक में कितना तटस्थ या जनोन्मुखी (दूसरे शब्दों में राजनीतिक हलकों का विरोधी) मार्ग अपना सके हैं ? इस दिशा में वह स्वातंत्र्योत्तर भारत में फैले भ्रष्टाचार से शुरुआत करते हैं। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार का सटीक चित्र खींचा है, जिसे आधार बना कर ही अन्ना हजारे और उनके साथियों ने अपने संघर्ष की शुरुआत की थी।

लेखक ने राजनीतिक गलियारों की उन दिनों की उठा-पटक का भी अच्छा खाका खींचा है। यह सत्ता का कथित घमंड और अन्ना का नितांत निर्लिप्त व्यक्तित्व ही था, जिसने इस आंदोलन को विदेशों तक में प्रसिद्धि दिलाई। कहना न होगा कि ऐसे ही कुछ कारण थे कि चंद राजनीतिक समीक्षकों ने इस आंदोलन को लगभग उन्हीं पश्चिम एशियाई देशों में तेजी से उठ खड़ी हुई ‘जैस्मिन रेवोल्यूशन’ के अहिंसक भारतीय स्वरूप के तौर पर भी देखना शुरू कर दिया था, लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र की गहरी जड़ें इतनी आसानी से हिलने वाली नहीं थीं और बकौल लेखक, अन्ना आंदोलन की ऐसी कोई मंशा भी नहीं थी।

पुस्तक का असली कलेवर पत्रकारीय ही है। लेखक ने ‘जो देखा, सो कहा’ के अंदाज में अपनी बात रखने का सीधा प्रयास किया है। कुछ स्थानों पर पत्रकारीय जगत की मजाहिया भूल-चूक के अंश हैं तो कई जगह एक कुशल पत्रकारीय दृष्टि भी दिखती है। अपनी साफगोई के दायरे में लेखक खुद अन्ना का भी तटस्थ मूल्यांकन करता है। ‘हिंद स्वराज ट्रस्ट’ के मामले में कुछ देर को उठा शोर ऐसा ही एक मुद्दा था।

दिल्ली में अन्ना हजारे की 16 अगस्त 2011 को गिरफ्तारी के बाद से इस अभियान ने जो रफ्तार पकड़ी थी, उसका आंखों देखा हाल पूरे देश और दुनिया ने देखा था। तो आखिर क्या कारण थे उस गिरफ्तारी के? आशुतोष के अनुसार यह नौकरशाहों और वकीलों की सलाह पर चल रही सरकार के कारण हुआ था। तिहाड़ जेल से अन्ना के बाहर आने पर इनकार करने पर एक डीआईजी के कमरे तक उन्हें ले जाकर तकनीकी तौर पर अन्ना को रिहा मान लिया गया था। लिहाजा, शुरुआत से अंत तक राजनीतिक सोच-समझ का अभाव सरकार में दिखा था। विपक्ष की राय भी इस मुद्दे पर कुछ ऐसी ही थी।

तिहाड़ जेल से रामलीला मैदान तक की पूरी खींचतान के बावजूद अन्ना का मैराथन अनशन अपने आप में तात्कालिक तौर ही पर सफल रहा था। देश के दूर-दराज से लोग राजधानी में जुटे और अन्य शहरों में भी ‘मैं भी अन्ना’ के नारे सुनाई दिए थे। लेकिन गत जून में बाबा रामदेव के धरने के दौरान जो पुलिसिया कार्रवाई हुई थी, वैसी गलती दोहराना किसी भी तरह सरकार के पक्ष में नहीं होता। इसके अलावा, लेखक अन्ना आंदोलन के बारे में राजनेताओं द्वारा बढ़-चढ़ कर कही गई विदेशी हाथ की बात को भी सिरे से नकारते हैं।

कुछ बुनियादी सवाल फिर भी मुंह बाए खड़े रहे। जैसे कि कथित प्रगतिशील धड़ा क्योंकर पूरी तरह चुप्पी साधे रहा या अंग्रेजीदां बौद्धिक क्यों एक ‘गंवई’ आदमी की इस हिमाकत को अखबार के पन्नों में या टीवी स्क्रीनों पर लताड़ते रहे? खुद टीम अन्ना के ही कुछ सदस्य क्यों उससे टूट कर अलग हुए ? आखिर युवाओं के अनन्य समर्थक राहुल गांधी क्यों चुप्पी साधे रहे? पुस्तक ऐसे कई सवाल उठाती है, लेकिन उनके जवाब काफी हद तक दबे-छुपे रहते हैं। यानी पाठक किसी बड़े ‘रहस्योद्घाटन’ से वंचित रह जाता है! हालांकि बीच में कुछेक स्थानों पर आने वाले विवरणात्मक अंश जरूर रोचकता जगाते हैं। इसलिए उम्मीद जरूर की जा सकती है कि भविष्य में इस संघर्ष पर लेखक की कलम से कुछ और भी पढ़ने को मिलेगा, जो नए कलेवर में होगा, क्योंकि लड़ाई अभी जारी है।
अन्ना-13 डेज दैट अवेकंड इडिया, लेखक: आशुतोष, प्रकाशक: हार्पर कॉलिंस, नोएडा-201301, मूल्य: 199 रु.

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  • Web Title:अन्ना आंदोलन की दास्तान