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आपके पड़ोस में भी हो सकता है सचिन

अपने संकोच की जंजीरों में कैद रहने के अभ्यस्त भारतीय क्षणिक उन्माद की तलाश में रहते हैं, ताकि कुछ समय के लिए ही सही, पर उल्लास के कुछ लमहे अपने लिए गढ़ सकें। पिछले शुक्रवार को सचिन के सौवें सैकड़े के साथ एक बार फिर उन्हें यह मौका घर बैठे ही हासिल हो गया। उत्साह, उल्लास, उमंग और उन्माद के इन पलों पर उनका हक है, क्योंकि इनके लिए उन्होंने एक साल पांच दिन लंबा इंतजार जो किया।

क्या तमाशा है? एक तरफ संसद में प्रणब मुखर्जी एक ऐसा बजट पेश कर रहे थे, जो हमें कम से कम साल भर के लिए नई दुश्वारियां देने जा रहा था। टेलीविजन ने आशंकाओं के इस दरिया को घर-घर पहुंचाने के लिए बेहतरीन इंतजाम किए थे। पर हिन्दुस्तानियों को बजट की जटिलताओं में सिर खपाने की फुरसत नहीं थी। वे सुबह से ही दोपहर ढलने का इंतजार कर रहे थे। सबको भरोसा था कि मीरपुर ‘मास्टर ब्लास्टर’ के लिए खुशकिस्मती का नया दरवाजा खोलने वाला साबित होगा। दादा के बजट से बड़ी आशंका तो इस बात से थी कि कहीं इस यकीन की गिल्लियां वैसे ही हवा में न बिखर जाएं, जैसी पिछले पूरे साल बिखरती रहीं। पर अपने विश्वास को कायम रखने की एक बड़ी वजह यह भी थी कि किस्मत के चक्रव्यूह से ज्यादा हमें सचिन पर भरोसा है। उन्हें यह चमत्कार करना ही था। मीरपुर ने इसका साक्षी बनने का अवसर हम सबको मुहैया करा दिया। मैच के बाद उन्होंने कहा कि मैं भगवान नहीं हूं और साथ ही यह दिलासा भी दी कि मेरा फिलहाल संन्यास लेने का कोई इरादा नहीं है। तो क्या हम कुछ और जादुई आंकड़ों के लिए खुद को तैयार रखें? उनके प्रशंसकों को ऐसी हसरत पालने का अधिकार है।

सचिन के खेल कौशल, विनम्रता भरे व्यक्तित्व और आम तौर पर भूल-चूक से परे रहने की अदा से समूची दुनिया वाकिफ है। हम भारत के लोग जिन मुट्ठी भर बातों पर गर्व कर पाते हैं, उसमें से एक यह भी है कि क्रिकेट के इस महान कारीगर ने सरजमी-ए-हिंद पर जन्म लिया। मैं यहां उनके प्रति पूरा सम्मान व्यक्त करते हुए, समूची विनम्रता के साथ उन लोगों को याद करना चाहूंगा, जो तमाम काबिलियत के बावजूद तेंदुलकर तो क्या, कुंबले भी नहीं बन सके। यकीनन हर्ष और उल्लास के इस मौके पर समूची संजीदगी के साथ हमें इस गंभीर मुद्दे पर विचार करना चाहिए। किसी व्यक्ति को उसकी नश्वरता से उठाकर परंपरा का दर्जा देने-दिलाने का इसके अलावा कोई और जरिया नहीं हो सकता।

बात उन दिनों की है, जब सचिन जन्मे भी नहीं थे। उन दिनों मैं दर्जनों ऐसे बच्चों को जानता था, जो मन-प्राण से क्रिकेटर बनना चाहते थे। वह भारतीय स्पिन का स्वर्ण युग था। हम हिन्दुस्तानी मान बैठे थे कि तेज गेंदबाजी हमारे वश की नहीं है। हम या तो गावस्कर और विश्वनाथ जैसे बल्लेबाज पैदा कर सकते हैं या फिर बेदी, प्रसन्ना, चंद्रशेखर या वेंकटराघवन। स्पिन गेंदबाजों की उन दिनों इतनी गलाकाट प्रतिस्पर्धा हुआ करती थी कि लोगों ने पद्माकर शिवालकर को नसीब वाला होने का दर्जा दे दिया था। शिवालकर अच्छे फिरकी गेंदबाज थे, पर उनका टेस्ट करियर अनौपचारिक होकर रह गया था। वह 1974 में श्रीलंका के खिलाफ दो गैर आधिकारिक टेस्ट ही खेल सके थे। उन दिनों इस द्वीपदेश को क्रिकेट के ‘टेस्ट परिवार’ में शामिल नहीं किया गया था। इसके बावजूद नौजवान क्रिकेटर उन्हें हसरत से देखते थे, क्योंकि उन्हें ये मैच खेलने का मौका हासिल हो गया था। वह टेस्ट क्रिकेट का जमाना था। किसी ने फटाफट क्रिकेट की कल्पना भी नहीं की थी। हम हिन्दुस्तानी स्पिन को अपनी मजबूती मानते थे। और डेनिस लिली या वेस्ली हॉल के अभाव को खुद को शास्त्रीयता का पुरोधा बताकर हल्का करने की कोशिश करते थे। इसके बावजूद क्रिकेट आज से कम जुनून भरा शौक नहीं हुआ करता था।

टेस्ट मैच के दिनों में कमेंट्री सुनने के शौकीन दफ्तर जाना छोड़ देते थे और प्रोफेसर कक्षाओं से नदारद होते थे। उसी चाय वाले की दुकान पर भीड़ होती थी, जहां रेडियो सेट होता था। वेस्ट इंडीज से मैच के दौरान तो कमाल ही हो जाता था। मोहल्ले के मोहल्ले जैसे रतजगे पर बैठ जाते थे। रात ढलने तक लोग रेडियो पर कान लगाए मैच के उतार-चढ़ाव को अपने मन की गहराइयों से महसूस करते रहते थे। जाहिर है, उन दिनों भी लाखों नौजवान फील्ड पर उतरने के लिए कमरतोड़ मेहनत करते दिखते थे।

मुझो याद है। इलाहाबाद के हर मोहल्ले में सड़क के किनारे फुटपाथ जहां भी जरा-सा चौड़ा होता था, लड़के क्रिकेट का अभ्यास करते दिखते थे। कोई प्रसन्ना की तरह हाथ ऊपर ले जाने की कोशिश करता था, तो किसी में बिशन सिंह बेदी बनने का जुनून सवार था। गावस्करों और विश्वनाथों की तो भीड़ लगी होती थी। मैं भी उनमें से एक था और क्रिकेट मेरे सपनों में आकर अक्सर एहसास के एक कोमल झटके से देर रात उठा दिया करता था। हम सब खेलने की एवज में स्कूल और घरों में पिटा करते थे। फिर भी एक हौसला था, जो साथ नहीं छोड़ता था। आज चार दशक बाद पलटकर देखता हूं, तो पाता हूं कि बहुत अच्छा माने जाने वाले राजकीय इंटर कॉलेज की हालत तब और खराब थी। वहां एक टूटी-सी ‘किट’ को चार से पांच दर्जन बच्चों के हवाले कर दिया जाता था। यह उन दिनों की बात है, जब टेस्ट टीम पर मुंबई और महानगरों का कब्जा हुआ करता था। वीनू मांकड जैसे गरीब-गुरबे भले ही शीर्ष तक पहुंचे हों, पर उनका नाम घरों में डरावने प्रतीक के तौर पर लिया जाता था।

उन्हीं दिनों एक क्रिकेटर का फोटो अखबार में छपा था। करियर ढलने के बाद वह मजदूरी किया करते थे। जाहिर है, अभिभावकों और अपनी जड़ताओं के अभ्यस्त अध्यापकों के लिए ये उदाहरण खुद को जहालत के गड्ढे में बनाए रखने का बेहतरीनतम जरिया होते थे। जरा सोचिए। जब समूचा परिवेश पुरजवान होती क्रिकेट आकांक्षा का गला घोटने पर आमादा हो, तो भला कौन नामुराद इस स्थायी बला से पार पाता। यही वजह है कि तेंदुलकर को सलाम करते हुए मैं उन लाखों प्रतिभाओं को श्रद्धांजलि देना चाहता हूं, जिनके स्वाभाविक कौशल को अकाल मौत के लिए मजबूर किया गया।

अफसोस, यह हाल अकेले क्रिकेट का नहीं था। उन दिनों हॉकी में हम शीर्ष पर थे। पर पतन की सीढ़ियां इसी तरह हर कस्बे और शहर में तैयार की जा रही थीं। चाहे एथलेटिक्स हो या कोई और खेल, इन सबका ये पराभव इसीलिए हुआ। अब हालात बदल रहे हैं। मुराद नगर और मेरठ जैसे कस्बाई शहरों से फटाफट क्रिकेट के स्टार निकलने लगे हैं। पर बच्चों में कमाऊ फसल का अक्स देखने वाले समाज की मानसिकता बहुत बदली नहीं है। खेलों को हमें अब नए नजरिये से देखने की जरूरत है। 

सचिन के शतकीय शतक पर उल्लास मना रहे लोग ऐसे में अपने घर या आसपास गौर से क्यों नहीं देखते? हो सकता है किसी नौजवान में भावी तेंदुलकर छिपा हो।

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