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अथ बिलाव विचार पर प्रश्नावली

कहानी पुरानी है। प्रसंग नया है। जो नए प्रसंग को समझा, वही पंडित। जो न समझा, वह खंडित। उसे एक दिन अखंड प्रायश्चित करने की सजा मिलनी ही है।
कहानी के अंत में कुछ सवाल ‘अभ्यास के लिए’ दिए गए हैं, ताकि कहानी का मर्म स्पष्ट हो सके। सभी सवाल जरूरी हैं। पढ़ें और उनके जवाब कहानी में से जरूर ढूंढ़े।

एक घर में किसी दिन एक बिल्ली मर गई। बहू को बड़ा पाप बोध हुआ कि उसने बिल्ली मार दी। यह बिल्ली विमर्श था, इसलिए इस सवाल को वहां नहीं उठाया गया कि बिल्ली के मरने के लिए घर की बहू को जिम्मेदार क्यों ठहराया गया। अगर यह बिल्ली विमर्श नहीं होता और स्त्री विमर्श होता, तो यह सवाल जरूर उठता कि बिल्ली जहां मरी थी, वहीं पड़ी रही। खैर, इस अमंगलकारी घटना से सभी डर गए। बहू को लगने लगा कि अगले जन्म में बिल्ली बनना पड़ेगा। बड़ी परेशानी। पंडितों से उपाय पूछा गया। पंडितों ने हिसाब लगाकर कहा कि इस महापाप का प्रायश्चित करना जरूरी है। उपाय यही है कि एक सोने की बिल्ली दान कर दी जाए। इस हेतु सोने की एक बिल्ली बनवाई गई।

पंडे अनुष्ठान करने लगे। अग्निहोत्र के कुंड में असली घी मिश्रित बनारसी समिधा की आहुतियों के साथ मंत्रपाठ चल रहा था। सुगंधित समिधा के जलने से चारों तरफ धुआं फैल रहा था कि अचानक पास में पड़ी हुई बिल्ली उठी और भाग गई!
हे तात! उत्तम कहानी वह, जो काम आए। इस कहानी को कई कहानीकार कह चुके। कई अभी कहेंगे। नए-नए सवाल उठते रहेंगे। 

सवाल हैं- कहानी की नायिका कौन है? बिल्ली या बहू? बिल्ली ने आखिर मरने का नाटक क्यों किया? अगर वह मरी रहती, तो यह कहानी होती कि नहीं? क्या कहानी तब बनी, जब वह उठकर भाग गई या फिर उसके उठकर भागने के बाद अच्छी-खासी कहानी हास्य में बदल गई? बताइए कि इसके बाद अब इसे हास्य की श्रेणी में रेखा जाए या हास्य व्यंग्य की कोटि में या व्यंग्य की विधा में?
यह सवाल दस नंबरी है। इसे ध्यान से पढ़ें और जवाब देने में कोई गलती न करें। आपकी सहायता के लिए नीचे उत्तर के रूप में ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ ‘घ’ के रूप में चार विकल्प दिए गए हैं, इनमें से आपको एक चुनना है। आप सही को सही करेंगे, तो पूरे नंबर, वरना आपको प्रायश्चित करना पड़ेगा!
कहानी की असली ‘बहू’ कौन है?
क: रसिक भोपाली जी
ख: बनारसी गिरगिट जी
ग: साकेती भौजी
घ: इनमें से कोई नहीं
सही उत्तर जानने के लिए निम्न पैराग्राफ को पढ़ सकते हैं।
साहित्य में बीसेक साल पहले शीतयुद्ध की बिल्ली मरी। उसने बड़े-बड़े शिकार किए। आदमी को चूहा बनाया। रचना को तमंचा बनाया। विचार को गोली की तरह चलाया। जिसे लगी, वह इतिहास से बाहर हो गया। और  जिसे नहीं लगी, वह बिल्ली को ढूंढ़ता रहा कि वह उसे मारकर उपकृत करे। प्रायश्चित करे और बिल्ली के इतिहास में वह पापी कहलाए। 

बिल्ली मरी, तो साहित्य में भी ‘प्रायश्चित’ होने लगा। बताइए, सबसे असली प्रायश्चित किसका है? ‘रसिक भोपाली जी’ का? ‘बनारसी गिरगिट जी’ का या ‘साकेती भौजी’ का? या किसी का नहीं?

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