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स्क्रीन पर जासूसी फेल

‘अभय देओल की प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘बसरा’ को उन्हीं की ‘मनोरमा सिक्स फीट अंडर’ वाले मृगदीप सिंह निर्देशित कर रहे हैं। इस फिल्म में अभय रॉ के एजेंट की भूमिका में नजर आएंगे।’ रामानंद सागर की ‘आंखें’ में धर्मेद्र देसी जेम्स बांड के रोल में दिखे थे। ’मनमोहन देसाई की ‘किस्मत’ में चॉकलेटी हीरो विश्वजीत जासूसी करते नजर आए थे। ‘रविकांत नगाइच की ‘सुरक्षा’ और ‘वारदात’ में गन मास्टर जी-9 बने मिथुन का किरदार फ्रेंचाइजी की तरह रचा गया था।

अब तैयार हो जाइए अगले हफ्ते एक और जासूसी एक्शन-थ्रिलर ‘एजेंट विनोद’ देखने के लिए जिसके बारे में यहां तक कहा जा रहा है कि इसे देखने के बाद आप हॉलीवुड की जेम्स बांड और ‘मिशन इम्पॉसिबल’ सीरिज की फिल्मों को भी भूल जाएंगे। खैर, यह तो अगले सप्ताह ही तय होगा, मगर यह तय है कि अगर इस किस्म की फिल्में दर्शकों की पसंदगी पाती रहीं तो अपने यहां जासूसी और रोमांच वाली फिल्मों का सुनहरा वक्त आने वाला है।

वैसे हिन्दी सिनेमा में जासूसी फिल्मों की परंपरा कभी कायदे से विकसित हो ही नहीं पाई। हॉलीवुड की फिल्मों में जहां जेम्स बांड श्रृंखला की फिल्मों के अलावा हिचकॉक, जेम्स हेडली चेइज या ‘मिशन इम्पॉसिबल’ सरीखी कई धाराएं उपजीं और लोकप्रिय भी रहीं, वहीं अपने यहां कोशिशें हुईं भी तो आटे में नमक बराबर। याद करें तो जितेंद्र वाली ‘फर्ज’ और धर्मेद्र वाली ‘आंखें’ दो ऐसी सुपरहिट फिल्में थीं जिनमें जासूस नायक को काफी ज्यादा पसंद किया गया। इनके अलावा देव आनंद की ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘ज्वेल थीफ’, राजेंद्र कुमार-राज कपूर की ‘दो जासूस’, मनोज कुमार वाली ‘वो कौन थी’, ‘अनीता’, ‘गुमनाम’ आदि भी कामयाब हुईं, लेकिन इनमें से ज्यादातर में जासूसी बस संदर्भ भर के लिए ही थी। ‘दो जासूस’ के बाद आई ‘गोपीचंद जासूस’ को नकार दिया गया। इसी तरह से रविकांत नगाइच ने मिथुन चक्रवर्ती को लेकर ‘सुरक्षा’, ‘वारदात’ जैसी कुछ फिल्मों की सिरीज बनाई लेकिन ‘सुरक्षा’ को छोड़ कर बाकी में उन्हें नाकामी ही हाथ लगी। 1977 में आई दीपक बाहरी के डायरेक्शन में बनी ‘एजेंट विनोद’ में सीक्रेट एजेंट विनोद को किडनैप कर लिए गए एक नामी वैज्ञानिक (नाजिर हुसैन) को तलाशने का केस सौंपा जाता है। यह फिल्म जरूर सफल हुई थी लेकिन इसने किसी परंपरा को जन्म नहीं दिया। हिन्दी फिल्मों में जासूसी आधारित सिनेमा की ऐसी किसी धारा के विकसित न हो पाने के पीछे बाजार का वही शाश्वत दबाव नजर आता है जिसने दर्शकों को 16 मसालों वाली चाट का आदी बना रखा था। हालांकि हॉलीवुड की जासूसी फिल्मों में भी दूसरे मसाले डाले जाते रहे हैं, लेकिन जहां उनमें बात आटे में नमक जैसी होती है, वहीं अपने यहां नमक के साथ-साथ भारी मात्र में मिर्च, हल्दी और गर्म मसाला भी डाला जाता है। वहां की फिल्मों में जहां नायक की चारित्रिक विशेषताएं शुरू से ही साफ कर दी जाती हैं, वहीं हिन्दी फिल्मों का नायक कभी गायक हो जाता है, कभी डांसर, कभी प्रेमी तो कभी खूनी और अंत में पता चलता है कि वह तो असल में जासूस है। अब सैफ अली खान वाली ‘एजेंट विनोद’ आ रही है और इसमें भी मसाले कोई कम नहीं डाले गए हैं।

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