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एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से निकाल ले गए

पश्चिमी दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहने वाले सौमित्र सेन के मध्यम वर्गीय परिवार के सभी सदस्यों की नजरें सुबह से खबरिया चैनलों पर टिकी थीं। मूलत: पश्चिम बंगाल के रहने वाले सेन तीन दशक पहले दिल्ली आए थे और अब दिल्ली के हो चुके हैं। यहां उनका अपना एक छोटा सा घर है। दो बच्चों हैं। बेटा इंजीनियरिंग पढ़ रहा है तो बेटी डॉक्टर बनना चाहती है और 12वीं की पढ़ाई के साथ-साथ पीएमटी की कोचिंग ले रही है।

प्राइवेट कंपनी में कार्यरत सेन की सालाना आय करीब आठ लाख रुपये है। पत्नी समय पास करने के लिए महिलाओं के लिए काम करने वाली एक स्वयंसेवी समूह से जुड़ी हैं, जो कम आय वाले क्षेत्रों में जाकर महिलाओं को आत्मनिर्भरता के गुर सिखाती है। बुजुर्ग-माता-पिता साथ रहते हैं।

पिता पेंशनर हैं। हाल में बढ़ी महंगाई, निजी नौकरी में अच्छा इंक्रीमेंट नहीं मिलने, प्राइवेट स्कूल कॉलेजों में पढ़ रहे बच्चों के बढ़ते खर्च के चलते घर के मुखिया सौमित्र सेन का हाथ तंग चल रहे हैं। दादा से राहत की उम्मीद थी। वह ज्यों-ज्यों बजट पढ़ते गए कभी लगा राहत मिल रही है तो अगले ही पल कह उठे, अरे! यह क्या, अभी तो राहत दी थी और अब दूसरे तरीके से वापस ले ली।

बजट भाषण थोड़ा और बढ़ा। लगा तोहफा मिला है। फिर पता चला हाथ आया तोहफा वापस छिन लिया गया है। बहरहाल दो घंटे के भाषण के बाद जब दादा का भाषण खत्म हुआ तो सेन परिवार को लगा कि एक हाथ से जो दिया, दूसरे हाथ से कहीं ज्यादा ले लिया।

सेन साहब को क्या मिला। जैसा कि ऊपर बताया है, उनकी सालाना आय तकरीबन आठ लाख रुपये है। तो आयकर सीमा 1.80 से दो लाख करने से उन्हें सिर्फ दो हजार रुपये का फायदा हुआ। बैंक में जमा राशि पर 10 हजार रुपये सालाना ब्याज पर छूट का ऐलान हुआ तो राहत महसूस की। लेकिन वह जल्द ही काफूर भी हो गई। क्योंकि उनके खाते में इतने पैसे ही नहीं है जिस पर 10 हजार रुपये का ब्याज कमाया जा सके।

सेन साहब को जिन बातों से राहत हुई, उनमें एक तो स्वास्थ्य की नियमित जांच पर पांच हजार रुपये के खर्च को आयकर छूट के दायरे में लाना है। अभी तक ऐसी छूट सिर्फ इलाज पर मिलती है। यदि कोई रुटीन जांच कराता है तो उसे छूट नहीं है।

परिवार में बच्चों, खुद की या बुजुर्गो की ऐसी जांच करानी पड़ती है जिन पर अभी कोई रिबेट नहीं है। लेकिन निराशा भी कम नहीं हुई। घर में छह सदस्य हैं और सभी के पास मोबाइल फोन हैं। सेवाशुल्क से छह मोबाइल फोनों के बिल में इजाफा होगा। कभी-कभी रेस्तरां में भोजन के लिए जाते थे।

सेन साहब को लग रहा कि अब इससे परहेज करेंगे क्योंकि रेस्तरां सेवाएं महंगी हो गई हैं। बजट के इंतजार में सेन साहब दो काम रोके बैठे थे। एक, पुराने टीवी को बदलकर एलसीडी टीवी और पुराने फ्रिज को बेचकर डबल डोर फ्रिज लेना। फ्रिज महंगा हो गया है। इसलिए उनकी कोशिश है कि एक अप्रैल यानी बजट लागू होने पहले फ्रिज खरीद लिया जाए।

जबकि एलसीडी टीबी के लिए उन्हें एक अप्रैल का इंतजार करना होगा।मिसेज सेन (गृहिणी) को इस बजट में कहीं राहत नहीं दिखती। सोना महंगा हो गया। इससे तत्काल कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि बेटी की शादी में अभी वक्त है। वे गैर ब्रांडेड आभूषण और कभी-कभी चांदी के कुछ आभूषण खरीदती हैं। वे महंगे हो गए हैं। हां, महिला स्वयंसेवी समूहों को 7 फीसदी की दर पर तीन लाख के कर्ज और समय पर अदायगी में 3 फीसदी की अतिरिक्त छूट से वह उत्साहित हैं।

उनके बेटे अभिषेक के लिए भी थोड़ी राहत है। निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में पहले वर्ष की फीस चुकाने में घर की जमा-पूंजी खर्च हो चुकी है। तीन सालों के लिए उसे शिक्षा ऋण चाहिए। लेकिन बैंक गारंटी मांगते हैं। इस बजट में शिक्षा ऋण जोखिम निधि की स्थापना की जा रही है, जिससे बिना किसी गारंटी के ऋण मिलना संभव होगा।

यदि किसी वजह से अदायगी नहीं हो पाती तो उसकी अधिकतम भरपाई सरकार करेगी। यू कर्ज अदायगी का टेंशन नहीं रहेगा। इसी प्रकार उनकी बहन प्रतिमा के लिए भी यह योजना लाभदायक हो सकती है। लेकिन अभी उन्हें तात्कालिक नुकसान यह हुआ कि सेवाकर बढ़ने से उनकी पीएमटी की कोचिंग महंगी हो गई है। साथ ही घर से कोचिंग सेंटर तक जाने के लिए एक ब्रांडेड आयातित साइकिल खरीदना भी उनके लिए महंगा हो गया है।

अब बात करते हैं घर के दो बुजुर्गो यानी सीनियर सेन और उनकी पत्नी की। बुजुर्गवार सेन पेंशनर हैं। सरकार ने उनकी आयकर छूट सीमा 2.25 लाख से बढ़ाकर 2.50 लाख कर दी है। थोड़ी राहत मिली। लेकिन उनकी पत्नी जो एक घरेलू महिला रही हैं और जिनका बजट से ज्यादा लेना-देना नहीं है। संयोग से उन्हें भी दादा का एक छोटा से तोहफा मिला है।

पोती की शादी के लिए उनके पति ने सालों पहले उन्हें कुछ रकम दी थी, जो आज बढ़कर डेढ़ लाख से अधिक हो चुकी है और उनके खाते हैं। इस पर 10 हजार के ब्याज पर छूट से उन्हें सीधा फायदा मिलेगा। मामूली राहत उन्हें दादा के उस कदम से मिल सकती है जिसमें प्रोबायोटिक खाद्यान्न, सोया प्रोटीन जैसे पौष्टिक आहारों पर उत्पाद शुल्क 30 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दिया है।

वैसे, इस पूरे परिवार को दादा के उस कदम ने भी राहत दी है जिसमें सिनेमेटोग्राफिक रिकॉर्ड संबंधी कापीराइट को सेवाकर के दायरे से बाहर कर दिया है। उन्हें उम्मीद है कि इससे सिनेमा के टिकट में थोड़ी कमी आएगी। दरअसल, इस परिवार के छोटे बड़े सभी फिल्म देखने के शौकीन हैं। बीड़ी, सिगरेट के दाम बढ़ने से यह परिवार खुश है। राह चलते जब लोग बीड़ी-सिगरेट पीते हैं तो उन्हें भारी दिक्कत होती है। वे तो इन्हें बंद करा देना चाहते हैं।

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