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समय के साथ अडिग रहेगा कीर्तिमान

सचिन तेंदुलकर का सौवां शतक ऐसी उपलब्धि है जिसके बारे में कभी सोचा नहीं जा सकता था। बीतते समय के साथ सबकुछ बदल जाता है। लेकिन यह ऐसा रिकॉर्ड है जो जैसा आज है, कल भी वैसा ही रहेगा। इसे चमत्कार ही कह सकते हैं। सचिन अभी खेल रहे हैं और वह ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके हैं जहां उन्हें चुनौती देने वाला उन्हें छोड़कर कोई नहीं।

जब मैंने पहली बार उन्हें खेलते देखा तो हैरत में पड़ गया- कोई आदमी इतने लंबे समय तक नेट्स पर मुंबई के तेज गेंदबाजों का भला कैसे सामना कर सकता है? याद रखिए, नेट पर तेज गेंदबाज अमूमन 20 गज या उससे भी कम दूरी से गेंदबाजी करते हैं क्योंकि वहां अंपायर तो होते नहीं नोबॉल कहने के लिए। इसके       बावजूद सचिन के पास उन गेंदबाजों को खेलने का काफी वक्त होता था। उनका एक शॉट आज भी जेहन में ताजा है- पीछे हटकर मिड विकेट पर लगाया गया उनका पंच। यह एक शॉट ही काफी था यह बताने के लिए उनमें क्या क्षमता है।

किसी व्यक्ति में प्रतिभा भरी हो सकती है, लेकिन उसे प्रदर्शन में तब्दील करने के लिए दिमाग और तकनीक के सामंजस्य की जरूरत होती है। सचिन की यह खूबी काबिले तारीफ है। कोई भी खिलाड़ी उतनी अपेक्षाओं के दबाव में नहीं खेला जितना सचिन। यहां तक कि सर डोनाल्ड ब्रैडमन भी नहीं। सचिन ने उन अपेक्षाओं के दबाव को अपना साथी बना लिया। उनकी एक खासियत यह भी है कि सफलता कभी उनके सिर पर नहीं चढ़ी। जिन गेंदबाजों के खिलाफ उन्होंने सैंकड़े-पर सैकड़ा जड़ा, वे भी इस महान शख्सियत के मुरीद ही रहे। सचिन की इस उपलब्धि को देखने का मौका मिलना हमारे लिए सौभाग्य की बात है।

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