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चुनौतियों से मुंह मोड़ता बजट

एक पुरानी कहावत है कि बजट सभी आर्थिक समस्याओं का रामबाण इलाज नहीं होता। आर्थिक समस्याओं को आर्थिक नीतियों से सुलझाया जाता है और ये नीतियां पूरे साल बनती रहती हैं, जबकि बजट साल में सिर्फ एक बार आता है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में अगले वित्त वर्ष का जो बजट पेश किया है, उसमें ऐसी नीतियों का जिक्र तो है, जिनसे कई आर्थिक समस्याओं को सुलझाया जा सकता है, लेकिन ये नीतियां बजट में कहीं लागू होती नहीं दिख रहीं। देश के सामने इस समय तीन बड़ी आर्थिक चुनौतियां हैं और यह बजट इन तीनों ही चुनौतियों का ठीक से मुकाबला करता नहीं दिख रहा है।

पहली चुनौती विकास दर में आई गिरावट को लेकर है। जीडीपी की विकास दर 6.9 फीसदी तक पहुंच गई है। यह सबसे चिंताजनक पहलू है। आप उसे अगले वित्त वर्ष में बढ़ाकर 7.6 फीसदी तक ले जाना चाहते हैं, और उसके अगले वर्ष में इसे 8.6 फीसदी तक ले जाने का इरादा है। लेकिन विकास दर को किस तरह बढ़ाया जाएगा, बजट में इसका कोई जिक्र नहीं है। अगर हम देखें, तो इस समय निवेशकों के हौसले पस्त हैं। अगर निवेश बढ़ेगा, तो जीडीपी भी बढ़ेगी। लेकिन बजट में ऐसी नीतियों का उल्लेख नहीं है, जो विकास दर बढ़ाने की उम्मीद बंधाती हों या निवेशकों को यह भरोसा देती हों कि उनका निवेश फलदायी होगा।

दूसरी बड़ी चुनौती वित्तीय घाटे को लेकर है। दरअसल इसके साथ ही चालू खाते का घाटा भी हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है। इन दोनों को मिलाकर जुड़वां घाटा कहा जाता है, यह जुड़वां घाटा तेजी से बढ़ रहा है। वित्तीय घाटा 5.9 फीसदी तक चले जाने की बात कही जा रही है, लेकिन अंत में यह वित्तीय घाटा छह फीसदी तक पहुंच ही जाएगा। अब अगर इसमें राज्यों का भी वित्तीय घाटा जोड़ लिया जाए, तो यह नौ फीसदी तक हो जाएगा, जो काफी खतरनाक है। वित्तीय घाटा तब बढ़ता है, जब सरकार की आमदनी कम हो और खर्च बढ़ जाए। आर्थिक मंदी के कारण जीडीपी घटी है, तो सरकार का राजस्व भी घटना ही था। फिर सरकार ने विनिवेश का जो लक्ष्य तय किया था, वह भी पूरा नहीं हो सका। समस्या यह है कि आगे के लिए भी कोई बड़ी उम्मीद नहीं बंधती।

वित्त मंत्री ने यह जरूर कहा है कि वह वित्तीय घाटे को एक फीसदी तक घटाएंगे। लेकिन कैसे? यह तब तक संभव नहीं है, जब तक आप सब्सिडी को नहीं घटाते। ऑयल सब्सिडी के बारे में कहा गया है कि डीजल और केरोसिन की सब्सिडी अब सीधे उपभोक्ताओं को नकदी के रूप में सौंपी जाएगा। लेकिन यह डॉयरेक्ट कैश ट्रांस्फर होगा कैसे? जिन उपभोक्ताओं को इसका फायदा देना है, क्या उनकी पहचान कर ली गई है? नहीं, तो कब तक की जाएगी? कब तक कैश ट्रांस्फर का तंत्र बनकर पूरी तरह तैयार हो पाएगा? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन्हें इस योजना का फायदा नहीं दिया जाएगा, उन्हें क्या बाजार दर पर डीजल और केरोसिन मिलेगा? अगर ऐसा है, तो यह बहुत बड़ा नीतिगत बदलाव होगा।

लेकिन इसके बारे में कुछ बताया नहीं गया। कैश ट्रांस्फर की बात ही यूरिया पर सब्सिडी के मामले में की गई है। और वहां भी सवाल यही है। बजट में यह तो कहा गया है कि सब्सिडी को जीडीपी की दो फीसदी से ज्यादा बढ़ने नहीं दिया जाएगा। लेकिन यह एक वायदा, एक लक्ष्य भर है। जब तक आप इसका सही तरीका नहीं साफ करते, इस पर विश्वास कौन करेगा? बाजार को सहज ही यह विश्वास नहीं होगा कि इस लक्ष्य को हासिल भी किया जा सकता है या नहीं।

तीसरी चुनौती कुछ खास क्षेत्रों में संरचनात्मक बदलावों को लेकर थी। बजट में इसके लिए भी बहुत कुछ नहीं किया गया। हम विकास में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की बात बहुत कर रहे हैं, लेकिन इस क्षेत्र के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, क्योंकि सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार इसी क्षेत्र में मिल सकते हैं। इसी तरह विद्युत, नागरिक उड्डयन और गैर परंपरागत ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े बदलावों की जरूरत थी, लेकिन वैसा दिखा नहीं। विद्युत व नागरिक उड्डयन क्षेत्र के लिए जो किया भी गया, वह बहुत कम है।

इन दोनों क्षेत्रों को एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग की इजाजत दी गई है, जिससे इस क्षेत्र की पूंजी की समस्या कुछ हद तक खत्म होगी। उड्डयन के लिए टरबाइन फ्यूल को लेकर कुछ बदलाव किए गए हैं, हालांकि इस मामले में सेल्स टैक्स का मसला सुलझाने की जरूरत थी, जिसके लिए कुछ नहीं किया गया। विद्युत क्षेत्र के लिए इतना भर किया गया कि कोयला कंपनियों को अबाध आपूर्ति के लिए बाध्य किया जाएगा, लेकिन कोयले के कारोबार में सुधार की जरूरत थी, उसके लिए कोई बात नहीं दिखी।

इन तीन चुनौतियों के अलावा क्षेत्रीय विषमता व आमदनी की असमानता को कम करने के लिए कदम उठाने की जरूरत थी। दोनों तरह की विषमताएं हमारे देश में तेजी से बढ़ रही हैं। इसके लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए।

बजट में कुछ अच्छी चीजें हैं। एक तो इसमें डॉयरेक्ट टैक्स कोड के लागू होने का इंतजार नहीं किया गया है। उससे जो सुविधाएं करदाताओं को मिलनी थीं, वे वैसे ही दे दी गई हैं। काले धन को कम करने के लिए भी कुछ कदम उठाए गए हैं। जीएसटी की ओर कदम बढ़ाए गए हैं।  फिलहाल जो राजनीतिक हालात हैं,उनमें इससे ज्यादा कुछ उम्मीद भी नहीं की जा सकती। वित्त मंत्री ने एक तरह की होल्डिंग एक्सरसाइज की है। दो दिन पहले रेल बजट के बाद जो राजनीति हुई, वे अपने बजट के लिए वैसा हश्र नहीं चाहते होंगे। इस लिहाज से यह राजनीतिक स्थिरिता का बजट है। इसमें राजनीतिक स्थायित्व का लक्ष्य ज्यादा दिखाई देता है, आर्थिक स्थायित्व का कम। खामियों व चंद अच्छी चीजों के बाद भी यह एक औसत बजट ही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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