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ऊंट के मुंह में जीरा है रक्षा प्रावधान

वर्ष 2012-13 के लिए प्रस्तावित आम बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए कुल 1,93,407 करोड़ रुपये आबंटित किए गए हैं। पिछले साल की तुलना में यह 17 फीसदी ज्यादा है। वर्ष 2011-12 में देश का रक्षा प्रावधान 1,64,415.49 करोड़ था। उस वक्त इस रक्षा मद में 11.59 फीसदी की बढ़ोतरी की गई थी। इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती कि देश की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है।

ऐसे में, अगर रक्षा मद में हम इसी तरह से मामूली बढ़ोतरी करते रहे, तो हमारे सामने कई तरह के संकट खड़े हो सकते हैं। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान व चीन से हमारे रिश्ते बेहतर नहीं हैं। और रक्षा खर्च के हिसाब से इनसे तुलना करें, तो हम काफी पीछे चल रहे हैं। पाकिस्तान तो अपने सकल घरेलू उत्पाद का पांच से छह फीसदी हिस्सा रक्षा क्षेत्र पर खर्च करता है।

उधर, इस साल से चीन का रक्षा बजट भी लगभग 106.41 बिलियन डॉलर होगा। अगर ये दोनों मुल्क सीमा पर अपने बजट का अधिकतम हिस्सा लगा रहे हैं, तो यह हमारे लिए खतरे की घंटी है। इस लिहाज से वित्त मंत्री ने जो रकम रक्षा क्षेत्र को आबंटित की है, वह ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। अब इतनी राशि से कैसे चीनी सीमा पर सरकार अपनी तमाम योजनाओं को लागू कर पाएगी?

दरअसल, रक्षा क्षेत्र के लिए एक दसवर्षीय योजना की जरूरत है और इसका एकमात्र तरीका यह है कि इस मद में जीडीपी का तीन फीसदी हिस्सा अगले दस साल के लिए तय कर दिया जाए। हालांकि यह आंकड़ा भी कम ही है, लेकिन इससे स्थायी और संतुलित खर्च के रास्ते खुलेंगे।

आज सैन्य जरूरतें काफी बढ़ गई हैं। हमें अत्याधुनिक हथियार लेने हैं। हथियारों के चयन से लेकर ट्रायल और फिर सेना के शस्त्रगार में शामिल करने तक की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। और इस दौरान काफी रुपये खर्च होते हैं। भारतीय नौसेना के पास चीन की तुलना में पनडुब्बियों की कमी है। अब जब हम एयरक्राफ्ट कैरियर खरीद रहे हैं, तो इनकी सुरक्षा के लिए पनडुब्बियों की संख्या बढ़ानी ही होगी। तोपखाने में पुराने एल-60, एल-70 गन हैं। हमारी सेना के पास नवीनतम राइफल नहीं हैं। इस तरह, देखा जाए, तो हथियार खरीद में भी असंतुलन है।

इसके अलावा सेना का संचार तंत्र के आधुनिकीकरण की जरूरत है। ये जरूरतें पूरी करने की बजाय कुछ रकम रक्षा क्षेत्र के हवाले कर दिया जाता है और साल के अंत तक इनमें से भी कुछ राशि बचा ली जाती है। नतीजतन, देश का लगभग 40 फीसदी इलाका नक्सलवाद की चपेट में है और सीमावर्ती राज्यों में घुसपैठ व दहशतगर्दी में दस फीसदी का इजाफा हुआ है। ऐसे में, मौजूदा कम बजट आबंटन और हमारी रक्षा नीतियों व खर्चों को देखते हुए इस्लामाबाद तथा बीजिंग में बैठे उनके रणनीतिकार ही खुश हो रहे होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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