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उठ मत, जाग मत, बदल मत, पर चल

आप सभी जानते हैं कि पिछले दिनों यूपी की राजनीति साइलेंट मोड पर थी। एक चुनावी सन्नाटा था, जो कफ्यरू की तरह छाया हुआ था। अब चकाचक है। सारे नौजवान औरंगजेब वाली दाढ़ी मुड़ाकर क्लीन शेव हो गए हैं। पिंजरे तोड़कर नौजवान पंछी चाहे जहां विचरने लगे हैं। अमराइयों में अमियां पका आम बनने की प्रक्रिया में है। जो भी कहीं लाइन में है, अपने को बेरोजगार बता रहा है।

हाई स्कूल पास टेबलेट के चक्कर में है। जो बच्चे कभी लेमनचूस से बहल जाते थे, अब बिना लैपटॉप के नहीं मान रहे हैं। संपेरों के मजे हैं। पुराने अफसर उन्हें बुलवाकर सांप सूंघ रहे हैं। पुलिस वाले अनिच्छा से विनम्र होकर, ‘अबे वो उल्लू के पट्ठे श्रीमानजी’, कहने को मजबूर हैं। गुंडे केंचुल बदल रहे हैं। नवोन्मेष की बेला है। बड़े से बड़ा अकड़ बैल दूध देने को तत्पर है। नवोदय है। नवजीवन है। पूरी यूपी धन्य-धन्य है। सुना है यादव कुल शिरोमणि श्रीकृष्ण द्वारिका नगरी छोड़कर फिर से यूपी आने की फिराक में हैं। उन्होंने इसीलिए उद्धवजी को लखनऊ भेजा है। वह शपथ ग्रहण समारोह में दिखाई भी दिए थे।

यूपी में इधर साइकिलों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसी साइकिलें बाजार में आ रही हैं, जो दोनों हाथ छोड़कर चलाई जा सकें। जजर्र साइकिलों के दिन बहुर गए हैं। कई तो बिना टायर-टय़ूब के ही चलने लगी हैं। गूंगी कोयल तक सोहर गाने लगी है। कमल को छोड़कर सभी फूल मदमाती महक फैला रहे हैं। बिना चादर के हाथी लजा रहे हैं कि काश! उन्हें कोई ऐसी अवस्था में देख न ले। बूढ़े खुशी मना रहे हैं कि देखो, बाप के जूते में बेटे का पांव आ ही गया।

कुछ कुंठित आलोचक कह रहे हैं कि अब यूपी में है क्या। न माया, न ममता। वेदना और संवेदना, दोनों गायब। इधर मौसम में भी जवानी फूटने लगी है। गरमियां आने लगी हैं। हारे हुओं की तरह धूप का पारा गरम हो रहा है। गेंडों की खाल में दरारें पड़ने लगी हैं। आने वाले दिनों में मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी मिलने की आशंका है। सूरज अभी से आग उगलने लगा है। ठरकी बूढ़े कह रहे हैं कि है कोई नौजवान, जो इसे निगलकर दिखाए।
उर्मिल कुमार थपलियाल

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