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सपने और इच्छाएं

उनके सपनों का क्या हुआ? वह अक्सर सोचते हैं और परेशान होते हैं। अरसा पहले उन्होंने सपने देखना ही बंद कर दिया। अब तो कुछ करने की भी इच्छा नहीं होती।

जिंदगी में सपनों की एक तय जगह होती है। प्रोफेसर आर्थर डॉब्रिन का मानना है कि सपने देखते रहना बेहद जरूरी है। सपने और इच्छाएं एक-दूसरे के पूरक हैं। इनके बिना जिंदगी चुक जाती है। वह हॉफ्स्ट्रा यूनिवर्सिटी में एथिक्स पढ़ाते हैं। उनकी मशहूर किताबें हैं, ‘एम आई राइट : हाउ टू लिव एथिकली’ और ‘लव योर नेबर्स: स्टोरीज ऑफ वैल्यूज ऐंड वचरूज।’

आखिर सपने देखने का क्या मतलब है? यही न कि हम जिंदगी से लबालब भरे हैं। एक खास तरह की जिंदगी जीना चाहते हैं। और उसके लिए सपने देखते हैं। दरअसल, एक खास तरह से जीने की जब इच्छा होती है, तो हम सपने देखते हैं। इसे दूसरी तरह भी कह सकते हैं। हम जब सपने देखते हैं, तो अलग तरह जीने की इच्छा होती है।  

सपनों का टूट जाना या इच्छाओं का मर जाना एक ही बात है। सपने टूट जाते हैं, तो जीने की इच्छा कहां होती है? और जब इच्छा ही मर जाती है, तो फिर जिंदगी में सपनों का क्या काम? हमारी जब इच्छाएं मर जाती हैं, तो जिंदगी कैसी हो जाती है? किसी तरह सरकती या घिसटती एक जिंदगी। तब हमें कुछ भी नया करने की इच्छा नहीं होती। यह नया करने की इच्छा कभी खत्म नहीं होनी चाहिए। यह खत्म नहीं होगी, तो सपने देखना कभी नहीं रुकेगा। और हम सपने देखते रहेंगे, तो इच्छाएं कभी मरेंगी नहीं।

इच्छाओं को लगाम लगाना एक बात है। लेकिन कोई भी इच्छा न होना बिल्कुल दूसरी बात है। अगर संसार से ऊपर उठने की भी बात है, तो वह भी एक इच्छा ही है। सो, अपनी जिंदगी से इच्छाओं और सपनों को गायब मत कर दीजिए। वे हमारे जीने की शर्त हैं।
राजीव कटारा

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