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खतरों से बचकर

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के इस वर्ष के बजट से बहुत ज्यादा उम्मीदें थीं। वित्त मंत्री ने खुद स्वीकार किया कि अर्थव्यवस्था मुश्किल वक्त से बाहर आने की कोशिश कर रही है। अर्थशास्त्री और उद्योगपति इस बजट में दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर कोई ठोस कार्रवाई की उम्मीद कर रहे थे, पहला मुद्दा बढ़ते वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने का था और दूसरा, निवेश और विकास को गति देने का।

दोनों ही मुद्दों को वित्त मंत्री ने भाषण में जरूरी महत्व दिया भी, लेकिन ठोस कदमों से ज्यादा इरादों की घोषणा की। यह अपने आप में एक अच्छा वक्तव्य है कि वित्तीय घाटे को जीडीपी के दो प्रतिशत से ज्यादा नहीं बढ़ने दिया जाएगा और यह मुमकिन भी है, लेकिन इसके रास्ते में जो कठिनाइयां आएंगी, उन्हें वित्त मंत्री से ज्यादा कौन समझ सकता है।

वित्त मंत्री ने सब्सिडी पर खर्च घटाने की बात की है, पर जैसा कि पिछले वर्ष हुआ कि सब्सिडी बिल बजट अनुमानों से कहीं ज्यादा बड़ा निकला। इसी तरह, बजट घाटे को सरकार ने 4.6 प्रतिशत तक लाने की बात कही थी, वह भी 5.9 प्रतिशत तक पहुंच गया। इसीलिए यह उम्मीद करना कि इस वर्ष सरकार 5.1 प्रतिशत तक घाटे को सीमित कर पाएगी, असंभव तो नहीं, पर मुश्किल जरूर है, खास तौर पर खाद्य सुरक्षा के लिए रकम का इंतजाम अगर जोड़ लिया जाए।

जैसा अर्थशास्त्री सोचते हैं, वैसा वित्त मंत्री के लिए करना संभव अक्सर नहीं होता। अर्थशास्त्री सैद्धांतिक स्तर पर सोचते हैं, वित्त मंत्री को व्यवहार में करना होता है और राजनीति भी उतनी ही यथार्थ है, जितनी अर्थव्यवस्था। इस बजट से साफ है कि वित्त मंत्री ऐसा कुछ नहीं करना चाह रहे थे, जो विवादास्पद हो और जिससे संप्रग के सहयोगियों और विरोधियों को राजनीतिक गोला-बारूद मिल सके।

यह एक वास्तविकता है कि संप्रग सरकार एक गठबंधन सरकार है और उसे संसद में विशाल बहुमत नहीं हासिल है, ऐसे में वित्त मंत्री ने वही किया, जो इन सीमाओं में संभव हो। अर्थव्यवस्था के लिए जो कुछ वे करना चाहते हैं, उसके संकेत उन्होंने बजट में दिए, अपने इरादे जाहिर किए और यह उम्मीद जताई कि वह इन मुद्दों पर अपने सहयोगियों का समर्थन पाने की कोशिश करेंगे, और आम राय बन जाने पर उन्हें लागू करेंगे। इस मायने में यह बजट भले ही बहुत क्रांतिकारी न हो, तो यह ऐसा भी नहीं है कि इससे कोई उम्मीद न रखी जाए।

हर वित्त मंत्री को ठोस आर्थिक कदमों और लोक-लुभावन फैसलों के बीच एक संतुलन बनाए रखना पड़ता है। समस्या यही है कि प्रणब मुखर्जी ने इस संतुलन का सिर्फ एक खाका पेश किया, उसके विस्तार में भले ही वे न जाते, लेकिन कुछ संकेत तो दे ही सकते थे। इससे न तो निवेशक और उद्योगपति संतुष्ट होंगे और न ही आम आदमी बहुत खुश हो सकता है, सिवाय इसके कि आम कर के ढांचे में जो फेरबदल किया गया है, उससे आम मध्यमवर्गीय आदमी को कुछ राहत मिल सकती है।

लेकिन यहां भी वित्त मंत्री ने अतिरिक्त सावधानी बरती और आयकर राहत को बीस हजार रुपये तक ही बढ़ाया। इसी तरह सब्सिडी घटाने की बात भी है, चूंकि बजट में सिर्फ इरादे ही जाहिर किए गए हैं, इसलिए इन पर भरोसा करना मुश्किल है। मसलन यह तो वित्त मंत्री भी जानते होंगे कि डीजल की कीमतें बढ़ाने का विचार करना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी। वित्तीय घाटा कम होने के ठोस आसार नहीं हैं, इसलिए महंगाई का डर मंडराता रहेगा और रिजर्व बैंक शायद ही ब्याज दरें कम करने में कुछ तेजी दिखाए।

निवेश बढ़ाने के लिए एक बड़ा संकेत होगा। प्रणब मुखर्जी यह जानते हैं कि ममता बनर्जी उनके साथ वैसा नहीं कर सकतीं, जैसा उन्होंने दिनेश त्रिवेदी के साथ किया, लेकिन गठबंधन सरकारों में सावधानी तो बरतनी ही पड़ती है।

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