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नेत्रदान की कोई सुध लेने वाला नहीं

बिहार विधानसभा में सदस्यों ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि राज्य में अंग प्रत्यारोपण कानून 1994 लागू होने और नेत्र बैंक होने के बावजूद स्वेच्छा से नेत्रदान करने वालों और अंधत्व के शिकार लोगों की कोई सुध लेने वाला नहीं है।

भाजपा विधायक विनोद नारायण झा ने अल्पसूचित प्रश्न के माध्यम से राज्य में नेत्रदान कार्यक्रम, पीएमसीएच स्थित एकमात्र सरकारी नेत्र बैंक की उपेक्षा और नेत्रदान को इच्छुक लोगों की सूची नहीं होने का मामला उठाया।

इस संबंध में सरकार की ओर से उत्तर देते हुए पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री गिरिराज सिंह ने स्वीकार किया कि पीएमसीएच और एक निजी संस्था द्वारा राजगीर में संचालित वीरायतन के नेत्र बैंक में बीते 10 वर्ष में अंधत्व के शिकार किसी भी व्यक्ति का नेत्र प्रत्यारोपण नहीं किया गया।

झा ने कहा कि दो चिकित्सक एसएल मंडल और राजीव कुमार नेत्रदान करने गये थे उन्हें लौटा दिया गया। पीएमसीएच स्थित नेत्र बैंक में बीते 40-50 साल से किसी को नेत्र नहीं लगा और अंधापन से मुक्ति नहीं मिली तो इस आई बैंक का क्या औचित्य है।

सिंह ने कहा कि दो लोगों को आई बैंक से लौटाने की जांच होगी। दानकर्ता की अनुपलब्धता और सक्षम तकनीशियनों के अभाव में पीएमसीएच का आई बैंक पूरी तरह से काम नहीं कर रहा है।

जदयू नेता श्रवण कुमार और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सदानंद सिंह ने सरकार से पूछा कि पीएमसीएच स्थित नेत्र बैंक पर बीते 10 वर्ष में उपकरणों की खरीद में कितना व्यय हुआ, कितने कर्मचारियों के पद स्वीकृत है, नेत्र बैंक क्या सुविधाओं से सुसज्जित है। 

हालांकि प्रभारी मंत्री ने इसका जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि कितने लोग नेत्रदान का आये इसकी सूची नहीं बन पायी है। गिरिराज ने कहा कि मीडिया के माध्यम से प्रचार प्रसार किया जाता है लेकिन नेत्रदान को बढा़वा देने में आशाजनक सफलता प्राप्त नहीं हुई है। विधानसभाध्यक्ष ने इस अवसर पर स्वैच्छिक नेत्रदान की घोषणा की। चर्चा के दौरान कई अन्य सदस्य भी नेत्रदान को इच्छुक दिखे।

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